छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास (1741-1854): Best for CGPSC Guide

छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास (1741-1854): प्रत्यक्ष शासन, सूबा व्यवस्था और ब्रिटिश विलय (CGPSC सम्पूर्ण गाइड)

छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास (1741-1854) एक ऐसा अध्याय है जिसने इस क्षेत्र की प्रशासनिक और सामाजिक संरचना को हमेशा के लिए बदल दिया।

लगभग 750 वर्षों के कलचुरि शासन के पतन के बाद, नागपुर के भोंसले मराठों का आगमन हुआ। छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास और उनका शासनकाल, जो प्रत्यक्ष शासन, शोषणकारी सूबा व्यवस्था और ब्रिटिश हस्तक्षेप के विभिन्न चरणों से गुजरा, CGPSC और Vyapam परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास पर यह पिलर पोस्ट आपको छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास और छत्तीसगढ़ में मराठा शासन के हर पहलू की गहराई से जानकारी देगा।

यह लेख हमारे मुख्य गाइड “छत्तीसगढ़ का संपूर्ण इतिहास” का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें हम विशेष रूप से मराठा काल पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। आइए, मराठा शासन के हर पहलू की गहराई से पड़ताल करें।


🔥 लेख एक नज़र में (Quick Overview)
  • शासन काल: 1741-1854 ई. (कुल 113 वर्ष)।
  • प्रमुख चरण: अप्रत्यक्ष शासन → प्रत्यक्ष शासन → सूबा व्यवस्था → ब्रिटिश अधीक्षण काल → पुनः भोंसला शासन।
  • स्वर्ण युग: बिंबाजी भोंसले का प्रत्यक्ष शासन (1758-1787)।
  • अंधकार युग: सूबा शासन व्यवस्था (1787-1818)।
  • ऐतिहासिक निर्णय: राजधानी का रतनपुर से रायपुर स्थानांतरण (1818 में, कैप्टन एग्न्यू द्वारा)।

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1. छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास: शासकों की सम्पूर्ण सूची (1741-1854)

छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास में मराठा शासन के दौरान सत्ता का स्वरूप बदलता रहा। यहाँ सभी महत्वपूर्ण शासकों और प्रतिनिधियों की क्रमबद्ध सूची दी गई है:

शासन का चरणशासक/प्रतिनिधिभूमिकाअवधि (अनुमानित)
अप्रत्यक्ष शासनरघुनाथ सिंहमराठों के अधीन कलचुरि शासक1741-1745
मोहन सिंहमराठों द्वारा नियुक्त शासक1745-1758
प्रत्यक्ष शासनबिंबाजी भोंसलेछत्तीसगढ़ के प्रथम मराठा शासक1758-1787
सूबा शासनव्यंकोजी भोंसलेसूबा शासन के संस्थापक (नागपुर से)1787-1811
महिपतराव दिनकरप्रथम सूबेदार1788-1790
विट्ठलराव दिनकरसूबेदार1790-1796
भवानी कालूसूबेदार1796-1797
केशव गोविंदसूबेदार (सबसे लंबा कार्यकाल)1797-1808
बीकाजी गोपालसूबेदार1809-1817
सखाराम हरि और सीताराम टांटियासूबेदार1817
यादवराव दिवाकरअंतिम सूबेदार1817-1818
ब्रिटिश अधीक्षण कालकैप्टन एडमंडप्रथम ब्रिटिश अधीक्षक1818
कैप्टन एग्न्यूसर्वाधिक महत्वपूर्ण अधीक्षक1818-1825
कैप्टन हंटरअधीक्षक1825
कैप्टन सैंडिसअधीक्षक1825-1828
कैप्टन क्रॉफर्डअंतिम ब्रिटिश अधीक्षक1828-1830
पुनः प्रत्यक्ष शासनरघुजी तृतीयछत्तीसगढ़ के अंतिम भोंसले शासक1830-1853
ब्रिटिश विलयलॉर्ड डलहौजीगवर्नर-जनरल (हड़प नीति)1854

एक नज़र में तीन महत्वपूर्ण चरण

छत्तीसगढ़ में मराठा शासन को इन तीन प्रमुख चरणों में समझा जा सकता है, जिनकी विस्तृत तुलना लेख के अंत में दी गई है:

बिंबाजी का प्रत्यक्ष शासनसूबा शासन (अप्रत्यक्ष)ब्रिटिश अधीक्षण काल (अप्रत्यक्ष)
स्वर्ण युग (समृद्धि)अंधकार युग (शोषण)सुधारों का युग (आधुनिक नींव)

मराठा काल के अन्य प्रमुख व्यक्तित्व और उनकी भूमिका

शासकों के अलावा, छत्तीसगढ़ के मराठा इतिहास को आकार देने में कई अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों की भी भूमिका थी:

व्यक्तित्वभूमिका / क्यों प्रसिद्ध हैं?
भास्कर पंतनागपुर के सेनापति, जिन्होंने 1741 में रतनपुर पर आक्रमण कर कलचुरि सत्ता का अंत किया।
उमाबाईबिंबाजी भोंसले की विधवा, जिन्होंने उनकी मृत्यु के बाद कुछ समय के लिए शासन संभाला।
आनंदीबाईबिंबाजी भोंसले की पत्नी, जो उनके साथ सती हो गई थीं।
महिपतराव दिनकरछत्तीसगढ़ के प्रथम सूबेदार।
विट्ठलराव दिनकर‘परगना पद्धति’ के सूत्रधार, जिन्होंने 27 परगनों का गठन किया।
केशव गोविंदसबसे लंबे समय तक (11 वर्ष) सूबेदार रहे।
कैप्टन एग्न्यूसबसे महत्वपूर्ण ब्रिटिश अधीक्षक, जिन्होंने राजधानी को रतनपुर से रायपुर स्थानांतरित किया।

2. मराठा आक्रमण की पृष्ठभूमि और कारण

18वीं शताब्दी तक, रतनपुर की कलचुरि (हैहय) सत्ता कमजोर हो चुकी थी। आंतरिक कलह और एक मजबूत केंद्रीय नेतृत्व की कमी ने राज्य को बाहरी आक्रमणों और छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास की नींव के लिए संवेदनशील बना दिया था।

(इस विषय पर अधिक जानने के लिए, हमारा [छत्तीसगढ़ में कलचुरि राजवंश का इतिहास] वाला लेख पढ़ें।) रतनपुर के तत्कालीन शासक रघुनाथ सिंह वृद्ध थे और अपने एकमात्र पुत्र की मृत्यु के शोक में डूबे हुए थे, जिससे उनकी शासन में रुचि कम हो गई थी।

इसी समय, नागपुर में रघुजी प्रथम के नेतृत्व में भोंसले मराठा एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभर रहे थे और अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे। इसी विस्तार नीति के तहत उनके सेनापति भास्कर पंत ने बंगाल अभियान पर जाते समय 1741 में रतनपुर पर आक्रमण किया।

3. चरण 1: अप्रत्यक्ष मराठा शासन (1741-1758)

भास्कर पंत के आक्रमण का सामना करने में असमर्थ, राजा रघुनाथ सिंह ने बिना युद्ध किए आत्मसमर्पण कर दिया। मराठों ने सीधे तौर पर सत्ता नहीं संभाली, बल्कि रघुनाथ सिंह को मराठों के प्रतिनिधि के रूप में शासन करने की अनुमति दी। यह एक रणनीतिक कदम था जिसका उद्देश्य क्षेत्र से वार्षिक कर (टकोली) वसूलना था।

1745 में रघुनाथ सिंह की मृत्यु के बाद, मोहन सिंह को शासक नियुक्त किया गया, जिन्होंने 1758 तक मराठों के अधीन शासन किया। इस अवधि को छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास में अप्रत्यक्ष शासन काल कहा जाता है क्योंकि सत्ता का केंद्र नागपुर में था, जबकि स्थानीय प्रशासन कलचुरि शासकों के हाथ में था।

त्वरित पुनरीक्षण: अप्रत्यक्ष शासन
  • समयकाल: 1741-1758
  • प्रमुख घटना: भास्कर पंत का रतनपुर पर आक्रमण (1741)।
  • शासक: रघुनाथ सिंह और मोहन सिंह (मराठों के अधीन)।
  • शासन प्रणाली: मराठों को वार्षिक कर (टकोली) देना।
  • निष्कर्ष: छत्तीसगढ़ पर मराठा प्रभुत्व की शुरुआत।

4. चरण 2: प्रत्यक्ष भोंसले शासन – बिंबाजी भोंसले का स्वर्ण युग (1758-1787)

1758 में मोहन सिंह की मृत्यु के बाद छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत हुई। छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास के अंतर्गत नागपुर के उत्तराधिकार समझौते के तहत, रघुजी प्रथम के सबसे छोटे पुत्र बिंबाजी भोंसले को छत्तीसगढ़ का क्षेत्र प्राप्त हुआ। उन्होंने यहाँ आकर प्रत्यक्ष शासन की बागडोर संभाली और रतनपुर को अपनी राजधानी बनाया।

बिंबाजी भोंसले का इतिहास उनके कुशल प्रशासन के लिए जाना जाता है और छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास में उनके शासनकाल (1758-1787) को छत्तीसगढ़ में मराठा काल का सबसे व्यवस्थित और लोक-कल्याणकारी दौर माना जाता है।

🔥 बिंबाजी भोंसले: एक कुशल प्रशासक और सुधारक
  • प्रशासनिक एकीकरण: उन्होंने रतनपुर और रायपुर की प्रशासनिक इकाइयों को एकीकृत किया, जिससे एक संगठित छत्तीसगढ़ राज्य की नींव पड़ी।
  • परगना पद्धति की शुरुआत: उन्होंने कलचुरिकालीन ‘गढ़’ व्यवस्था को सुव्यवस्थित करते हुए ‘परगना पद्धति’ की शुरुआत की, जो राजस्व संग्रह और प्रशासन का आधार बनी।
  • न्याय व्यवस्था: रतनपुर में एक नियमित न्यायालय की स्थापना की, जो निष्पक्ष न्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
  • राजस्व सुधार: उन्होंने भूमि का सर्वेक्षण कराकर राजस्व प्रणाली को तार्किक बनाया और अनावश्यक करों को समाप्त किया, जिससे किसानों को राहत मिली।
  • सांस्कृतिक योगदान: बिंबाजी एक कला और धर्म संरक्षक थे। उन्होंने रायपुर में दूधाधारी मठ और रतनपुर में रामटेकरी मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। विजयादशमी पर ‘स्वर्ण पत्र’ (सोनपत्ती) देने की परंपरा भी उन्होंने ही शुरू की थी।
  • स्वतंत्र शासन: यद्यपि वे नागपुर के अधीन थे, बिंबाजी ने लगभग एक स्वतंत्र शासक की तरह कार्य किया। वे राजस्व का कोई भी हिस्सा नागपुर नहीं भेजते थे और जमींदारों के साथ स्वयं संधियाँ करते थे।
🔥 अनछुआ पहलू: बिंबाजी भोंसले की तीन रानियाँ और छत्तीसगढ़ से उनका नाता

बिंबाजी भोंसले का शासन सिर्फ प्रशासनिक सुधारों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उनका व्यक्तिगत जीवन भी छत्तीसगढ़ के इतिहास से गहराई से जुड़ा है। उनकी तीन रानियाँ थीं, जिनकी कहानियाँ त्याग और समर्पण को दर्शाती हैं:

  • उमाबाई: यह बिंबाजी की पहली और सबसे प्रमुख रानी थीं। वह एक कुशल प्रशासक थीं और बिंबाजी की मृत्यु (1787) के बाद उन्होंने कुछ समय के लिए शासन की बागडोर संभाली थी।
  • उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता से सत्ता के संघर्ष को रोकने का प्रयास किया और छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास गौरवशाली बनाने में अपना योगदान दिया।
  • रमाबाई: यह बिंबाजी की दूसरी पत्नी थीं, जो निःसंतान थीं।
  • आनंदीबाई: यह बिंबाजी की तीसरी पत्नी थीं। बिंबाजी से उनका गहरा प्रेम था और उनकी मृत्यु के बाद वह रतनपुर के पास सेंदरी गाँव में उनके साथ सती हो गईं।
  • आज भी उस स्थान पर एक सती चौरा मौजूद है, जो उनके प्रेम और उस युग की सामाजिक प्रथा का प्रतीक और छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास को अमिट बनता है।

यह कहानी दिखाती है कि छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास केवल युद्ध और राजनीति का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों और बलिदानों का भी इतिहास है।

त्वरित पुनरीक्षण: बिंबाजी भोंसले का शासन
  • समयकाल: 1758-1787
  • शासक: बिंबाजी भोंसले (प्रथम प्रत्यक्ष मराठा शासक)।
  • राजधानी: रतनपुर।
  • प्रमुख सुधार: परगना पद्धति की शुरुआत, न्याय व्यवस्था, राजस्व सुधार।
  • महत्व: छत्तीसगढ़ के मराठा इतिहास का “स्वर्ण युग”।

5. चरण 3: सूबा शासन – अव्यवस्था और शोषण का काल (1787-1818)

“छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास में सूबा शासन एक ऐसी ठेकेदारी व्यवस्था थी जिसका एकमात्र उद्देश्य अधिकतम धन वसूलकर नागपुर भेजना था, भले ही इससे प्रजा का कितना भी अहित हो।”

1787 में बिंबाजी की मृत्यु के बाद छत्तीसगढ़ का दुर्भाग्य शुरू हुआ। उनके बाद शासक बने व्यंकोजी भोंसले ने छत्तीसगढ़ आने के बजाय नागपुर से ही शासन करने का निर्णय लिया। प्रशासन चलाने के लिए, उन्होंने अपने प्रतिनिधियों को नियुक्त करना शुरू किया, जिन्हें ‘सूबेदार’ कहा जाता था।

छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास में यहीं से छत्तीसगढ़ के सबसे काले अध्याय, ‘सूबा शासन व्यवस्था’ की शुरुआत हुई।

छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास में यह प्रणाली पूरी तरह से एक ठेकेदारी व्यवस्था थी। सूबेदारी का पद उस व्यक्ति को नीलाम किया जाता था जो नागपुर दरबार को सबसे अधिक राजस्व देने की बोली लगाता था। इस कारण, हर सूबेदार का एकमात्र लक्ष्य अपने कार्यकाल में जनता से अधिक से अधिक धन निचोड़ना होता था।

छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास के इस काल में भ्रष्टाचार, अराजकता और आर्थिक शोषण चरम पर था, जिससे छत्तीसगढ़ की समृद्धि को गहरी ठेस पहुँची।

🔥 अंधकार युग का सच: सूबा शासन की क्रूरता और पिंडारियों का आतंक

छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास में सूबा शासन को “लूट का काल” क्यों कहा जाता है? इसके पीछे कुछ ठोस कारण थे:

  • अत्याचारी कर वसूली: राजस्व बढ़ाने के लिए सूबेदारों ने हर संभव चीज़ पर कर लगा दिया था। लोगों को अपनी आय का 50% से 60% तक कर के रूप में देना पड़ता था। यहाँ तक कि ‘चरोटा भाजी’ जैसी सामान्य भाजी पर भी कर लगाया गया था, जिसे ‘पंडरी’ कर कहा जाता था।
  • पिंडारियों का गढ़: सूबेदारों की कमजोर प्रशासनिक पकड़ के कारण छत्तीसगढ़ पिंडारियों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बन गया था। पिंडारी क्रूर लुटेरों के दल थे जो गांवों में हमला करते, फसलें जला देते और भयानक लूटपाट करते थे। सूबा प्रशासन उन्हें रोकने में पूरी तरह विफल रहा, जिससे आम जनता का जीवन और भी दयनीय हो गया।

यह दौर सिर्फ़ प्रशासनिक अव्यवस्था का नहीं, बल्कि आम जनता के लिए भय और असुरक्षा का काल था।

🔥 अंधकार युग का सच: सूबा शासन की क्रूरता और पिंडारियों का आतंक

छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास में सूबा शासन को “लूट का काल” क्यों कहा जाता है? इसके पीछे कुछ ठोस कारण थे:

  • अत्याचारी कर वसूली: राजस्व बढ़ाने के लिए सूबेदारों ने हर संभव चीज़ पर कर लगा दिया था। लोगों को अपनी आय का 50% से 60% तक कर के रूप में देना पड़ता था। यहाँ तक कि ‘चरोटा भाजी’ जैसी सामान्य भाजी पर भी कर लगाया गया था, जिसे ‘पंडरी’ कर कहा जाता था।
  • पिंडारियों का गढ़: सूबेदारों की कमजोर प्रशासनिक पकड़ के कारण छत्तीसगढ़ पिंडारियों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बन गया था। पिंडारी क्रूर लुटेरों के दल थे जो गांवों में हमला करते, फसलें जला देते और भयानक लूटपाट करते थे। सूबा प्रशासन उन्हें रोकने में पूरी तरह विफल रहा, जिससे आम जनता का जीवन और भी दयनीय हो गया।

यह दौर सिर्फ़ प्रशासनिक अव्यवस्था का नहीं, बल्कि आम जनता के लिए भय और असुरक्षा का काल था।

6. सूबेदारों की सूची और उनके प्रमुख कार्य

सूबा शासन के दौरान कुल 7 सूबेदार नियुक्त हुए जिनका विवरण निम्नलिखित है:

सूबेदारकार्यकालप्रमुख घटना/कार्य
महिपतराव दिनकर1788-1790छत्तीसगढ़ के प्रथम सूबेदार। यूरोपीय यात्री फॉरेस्टर का आगमन इन्हीं के समय हुआ।
विट्ठलराव दिनकर1790-1796‘परगना पद्धति’ के सूत्रधार माने जाते हैं; इन्होंने 27 परगनों का गठन किया। यूरोपीय यात्री कैप्टन ब्लंट का आगमन।
भवानी कालू1796-1797इनका कार्यकाल बहुत छोटा था।
केशव गोविंद1797-1808सबसे लंबे समय तक सूबेदार रहे। इनके समय में पिंडारियों के हमले बढ़े।
बीकाजी गोपाल1809-1817इनके कार्यकाल में पिंडारियों का आतंक चरम पर था।
सखाराम हरि और सीताराम टांटिया1817अत्यंत अल्पकालिक कार्यकाल।
यादवराव दिवाकर1817-1818छत्तीसगढ़ के अंतिम सूबेदार। इनके बाद सूबा व्यवस्था समाप्त हो गई।

7. चरण 4: ब्रिटिश अधीक्षण काल – सुधारों का दौर (1818-1830)

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1818) में सीताबर्डी के युद्ध में भोंसले शासक अप्पा साहब की हार के साथ ही छत्तीसगढ़ अप्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया। चूँकि उत्तराधिकारी रघुजी तृतीय नाबालिग थे, इसलिए ब्रिटिश रेजिडेंट जेनकिंस ने शासन चलाने के लिए ‘ब्रिटिश अधीक्षकों’ की नियुक्ति की।

छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास में यह काल सूबा शासन के शोषण से त्रस्त जनता के लिए राहत लेकर आया। इस दौरान कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक सुधार हुए जिन्होंने आधुनिक छत्तीसगढ़ की नींव रखी। रतनपुर से रायपुर राजधानी का स्थानांतरण इसी काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी।

8. ब्रिटिश अधीक्षकों की सूची और उनके योगदान

  1. कैप्टन एडमंड (1818): छत्तीसगढ़ के प्रथम ब्रिटिश अधीक्षक। इनके समय में डोंगरगढ़ के जमींदार ने विद्रोह किया था।
  2. कैप्टन एग्न्यू (1818-1825): इन्हें इस काल का सबसे महत्वपूर्ण सुधारक माना जाता है। 1818 में इन्होंने राजधानी को रतनपुर से रायपुर स्थानांतरित किया, जो एक ऐतिहासिक निर्णय था। उन्होंने परगना व्यवस्था को पुनर्गठित किया और प्रशासनिक ढाँचे को सुव्यवस्थित किया।
  3. कैप्टन हंटर (1825): इनका कार्यकाल संक्षिप्त और बिना किसी विशेष घटना के रहा।
  4. कैप्टन सैंडिस (1825-1828): इन्होंने तहसीलदारी व्यवस्था की शुरुआत की। बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाने के लिए ‘ताहुतदारी’ प्रथा शुरू की।
  5. कैप्टन क्रॉफर्ड (1828-1830): अंतिम अधीक्षक। इन्होंने 1830 में शासन व्यवस्था वापस वयस्क हो चुके रघुजी तृतीय को सौंप दी।

9. चरण 5 और 6: पुनः भोंसला शासन और ब्रिटिश विलय (1830-1854)

1830 में, अंग्रेजों ने शासन रघुजी तृतीय को वापस सौंप दिया। उन्होंने नागपुर से ही ‘जिलेदारों’ के माध्यम से शासन चलाया। यह दौर अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा, लेकिन छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास और मराठा शक्ति अब पहले जैसी नहीं रही थी।

1853 में रघुजी तृतीय की निःसंतान मृत्यु हो गई। यह भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी के लिए एक सुनहरा अवसर था। उन्होंने अपनी कुख्यात ‘व्यपगत का सिद्धांत’ या ‘हड़प नीति’ (Doctrine of Lapse) का प्रयोग करते हुए 1854 में नागपुर साम्राज्य को ब्रिटिश भारत में मिला लिया।

इसके साथ ही, छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास और मराठा शासन का अध्याय समाप्त हो गया और ब्रिटिश शासन की प्रत्यक्ष शुरुआत हुई।

10. मराठा साम्राज्य के पतन के सामान्य कारण

छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास और मराठा शासन का अंत वास्तव में पूरे मराठा साम्राज्य के पतन का एक हिस्सा था। इसके मुख्य कारण थे:

  • अयोग्य उत्तराधिकारी: शिवाजी और शुरुआती पेशवाओं के बाद मजबूत और दूरदर्शी नेताओं का अभाव।
  • आंतरिक संघर्ष: सिंधिया, होल्कर, गायकवाड़ और भोंसले जैसे मराठा सरदारों के बीच आपसी ईर्ष्या और संघर्ष ने साम्राज्य को कमजोर कर दिया।
  • कमजोर अर्थव्यवस्था: लगातार युद्धों के कारण मराठा खजाना खाली हो गया था और प्रशासन राजस्व वसूली पर ही केंद्रित रह गया।
  • अंग्रेजों की कूटनीति: अंग्रेजों की “फूट डालो और राज करो” की नीति, बेहतर सैन्य रणनीति और जासूसी नेटवर्क मराठों पर भारी पड़ा।
  • पानीपत का तीसरा युद्ध (1761): इस युद्ध में मिली विनाशकारी हार से मराठों की प्रतिष्ठा और सैन्य शक्ति को गहरा आघात लगा, जिससे वे कभी पूरी तरह उबर नहीं पाए।

11. याद रखने की शॉर्ट ट्रिक (Mnemonic for CGPSC)

परीक्षा में शासकों का क्रम याद रखना अक्सर मुश्किल होता है। यहाँ दो आसान ट्रिक्स दी गई हैं:

🔥 महत्वपूर्ण क्रम याद रखने की ट्रिक्स (Memory Tricks)

छत्तीसगढ़ के सूबेदारों का क्रम (M-V-B-K-B-Y)

ट्रिक:My Very Brilliant Knowledge Brings You success.”

  • M – महिपतराव दिनकर
  • V – विट्ठलराव दिनकर
  • B – भवानी कालू
  • K – केशव गोविंद
  • B – बीकाजी गोपाल
  • Y – यादवराव दिवाकर

ब्रिटिश अधीक्षकों का क्रम (E-A-H-S-C)

ट्रिक:Edmund & Agnew Hunt for Sand & Crawford.” (एडमंड और एग्न्यू ने सैंड और क्रॉफर्ड के लिए शिकार किया)

  • E – एडमंड (Edmund)
  • A – एग्न्यू (Agnew)
  • H – हंटर (Hunter)
  • S – सैंडिस (Sandys)
  • C – क्रॉफर्ड (Crawford)

छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास तुलनात्मक विश्लेषण: मराठा काल के तीन प्रमुख चरण (CGPSC के लिए सबसे महत्वपूर्ण टेबल)

छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास और मराठा काल को बेहतर ढंग से समझने के लिए, आइए इसके तीन सबसे महत्वपूर्ण चरणों – बिंबाजी का प्रत्यक्ष शासन, सूबा व्यवस्था और ब्रिटिश अधीक्षण काल – की तुलना करें।

तुलना का आधारबिंबाजी भोंसले का शासन (1758-1787)सूबा शासन (1787-1818)ब्रिटिश अधीक्षण काल (1818-1830)
शासन का स्वरूपप्रत्यक्ष, स्वतंत्र और केंद्रीकृतअप्रत्यक्ष, ठेकेदारी पर आधारितअप्रत्यक्ष, सुधारवादी और संरक्षणात्मक
सत्ता का केंद्ररतनपुर (छत्तीसगढ़)नागपुरनागपुर (ब्रिटिश रेजिडेंट के माध्यम से)
मुख्य उद्देश्यसुव्यवस्थित और कल्याणकारी प्रशासन की स्थापनाअधिकतम राजस्व वसूल कर नागपुर भेजनाप्रशासनिक सुधार और शांति व्यवस्था स्थापित करना
राजधानीरतनपुररतनपुर (प्रशासनिक केंद्र)रतनपुर से रायपुर (1818 में)
आर्थिक प्रभावसमृद्धि और स्थिरता का कालअत्यधिक आर्थिक शोषण, “लूट का काल”आर्थिक स्थिति में सुधार और स्थिरता की वापसी
प्रशासनिक व्यवस्थापरगना पद्धति की शुरुआतपरगना पद्धति का विस्तार (विट्ठल दिनकर द्वारा)तहसीलदारी और ताहुतदारी प्रथा की शुरुआत
विरासत“स्वर्ण युग”, संगठित छत्तीसगढ़ की नींव“अंधकार युग”, आर्थिक पतनआधुनिक प्रशासनिक ढाँचे की नींव, रायपुर का उदय

12. छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास के अंतर्गत छत्तीसगढ़ पर मराठा शासन का प्रभाव और विरासत

छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास के अंतर्गत छत्तीसगढ़ पर मराठा शासन की विरासत मिश्रित है। सूबा शासन के आर्थिक शोषण ने क्षेत्र को नुकसान पहुँचाया, तो वहीं बिंबाजी भोंसले और ब्रिटिश अधीक्षकों के प्रशासनिक सुधारों ने आधुनिक छत्तीसगढ़ की नींव रखी।

राजधानी का रायपुर स्थानांतरण एक ऐसा ही निर्णायक कदम था जिसने आज के छत्तीसगढ़ की रूपरेखा तय की। कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ का मराठा इतिहास इस क्षेत्र के विकास का एक महत्वपूर्ण चरण था।

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संदर्भ और स्रोत (References and Sources)

ℹ️ विश्वसनीयता और सत्यापन

इस लेख में प्रस्तुत जानकारी को विश्वसनीय और प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित किया गया है ताकि आपको परीक्षा के लिए सबसे सटीक जानकारी मिल सके।

साहित्यिक और अकादमिक स्रोत

  • छत्तीसगढ़ वृहत संदर्भ (छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी): (छत्तीसगढ़ के इतिहास पर सबसे प्रामाणिक प्रकाशनों में से एक) – यह एक भौतिक प्रकाशन है।
  • छत्तीसगढ़ का राजनीतिक इतिहास – डॉ. प्यारेलाल गुप्त: (मराठा काल के विस्तृत विश्लेषण के लिए एक महत्वपूर्ण अकादमिक स्रोत) – यह एक भौतिक प्रकाशन है।

आधिकारिक वेबसाइटें (Official Websites)

  • छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड (आधिकारिक वेबसाइट): (रतनपुर और रायपुर जैसे मराठा कालीन स्थलों की ऐतिहासिक जानकारी के लिए) [आधिकारिक वेबसाइट देखें]
  • नागपुर जिला | महाराष्ट्र शासन (आधिकारिक वेबसाइट): (भोंसले शासकों और नागपुर साम्राज्य की आधिकारिक जानकारी के लिए, जो मराठा शासन का केंद्र था) [इतिहास पृष्ठ पर जाएं]

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

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