छत्तीसगढ़ की शिल्प कला: हाथों का हुनर, संस्कृति की पहचान (Ultimate Guide)
अगर लोक नृत्य और लोक गीत छत्तीसगढ़ की आत्मा की अभिव्यक्ति हैं, तो यहाँ की शिल्प कला उस आत्मा को साकार रूप देने वाली कला है। यह सिर्फ सजावटी वस्तुएं नहीं, बल्कि जनजातीय जीवन, उनकी आस्थाओं और प्रकृति के साथ उनके अटूट संबंध का एक मूर्त प्रमाण है। बस्तर के ढोकरा से लेकर सरगुजा के काष्ठ शिल्प तक, हर कलाकृति अपने आप में एक कहानी कहती है। M S WORLD The WORLD of HOPE में आपका स्वागत है, और आज हम छत्तीसगढ़ की शिल्प कला के इसी रचनात्मक संसार का अब तक का सबसे गहन और विस्तृत विश्लेषण करेंगे।
यह एक ‘क्लस्टर पोस्ट’ है, जो हमारे छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति पिलर का एक अभिन्न अंग है। इस लेख का लक्ष्य CGPSC, Vyapam और अन्य परीक्षाओं के लिए छत्तीसगढ़ की हर एक शिल्प कला की निर्माण प्रक्रिया, उसके प्रमुख केंद्र, संबंधित जनजातियों और उसके पीछे की कहानी को पूरी गहराई से कवर करना है।
तो तैयार हो जाइए, यह जानने के लिए कि कैसे साधारण मिट्टी, धातु और बांस छत्तीसगढ़ के कारीगरों के हाथों में आकर जीवंत हो उठते हैं। चलिए, इस कलात्मक यात्रा की शुरुआत करते हैं!
इस लेख में आप क्या पढ़ेंगे?
- छत्तीसगढ़ की शिल्प कलाओं का वर्गीकरण
- प्रमुख शिल्प कलाएं: एक मास्टर रिवीज़न टेबल
- धातु शिल्प का विस्तृत विश्लेषण
- काष्ठ शिल्प का विस्तृत विश्लेषण
- बांस, मिट्टी एवं अन्य शिल्प कलाएं
- विश्लेषण: शिल्प कला और ग्रामीण अर्थव्यवस्था
- परीक्षा फोकस: प्रीलिम्स vs मेन्स
- स्मार्ट रिवीज़न हैक्स: शिल्प कलाओं को कैसे याद रखें?
- निष्कर्ष
- ज्ञान की परीक्षा: शिल्प कला क्विज़
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. छत्तीसगढ़ की शिल्प कलाओं का वर्गीकरण
छत्तीसगढ़ की शिल्प कला अपनी विविधता और प्राकृतिक सामग्रियों के उपयोग के लिए जानी जाती है। इन कलाओं को उनके माध्यम (Material) के आधार पर मुख्य रूप से निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
- धातु शिल्प (Metal Craft): इसमें अलौह धातुओं (जैसे पीतल, कांसा) और लौह धातु (लोहा) का उपयोग किया जाता है। (उदा. ढोकरा शिल्प, लौह शिल्प)
- काष्ठ शिल्प (Wood Craft): इसमें लकड़ी पर की जाने वाली जटिल नक्काशी शामिल है।
- बांस शिल्प (Bamboo Craft): इसमें बांस का उपयोग करके उपयोगी और सजावटी वस्तुएं बनाई जाती हैं।
- मिट्टी शिल्प (Terracotta): इसमें मिट्टी को पकाकर मूर्तियाँ और बर्तन बनाए जाते हैं।
- अन्य शिल्प: इसमें तुमा (लौकी), पत्थर और कौड़ियों का उपयोग शामिल है।
2. प्रमुख शिल्प कलाएं: एक मास्टर रिवीज़न टेबल
यह मास्टर सारणी छत्तीसगढ़ की सभी महत्वपूर्ण शिल्प कलाओं और उनसे जुड़ी प्रमुख जानकारियों को एक ही स्थान पर प्रस्तुत करती है, जो परीक्षा से पहले त्वरित रिवीज़न के लिए अत्यंत उपयोगी है। छत्तीसगढ़ की शिल्प कला की यह विविधता अद्भुत है।
| शिल्प कला | माध्यम (Material) | संबंधित जनजाति / समुदाय | प्रमुख केंद्र |
|---|---|---|---|
| ढोकरा शिल्प (घड़वा कला) | पीतल, कांसा, मोम | घड़वा, झारा | कोंडागांव, बस्तर, रायगढ़ |
| लौह शिल्प | लोहा (Wrought Iron) | अगरिया, गोंड | कोंडागांव, बस्तर |
| काष्ठ शिल्प | सागौन, शीशम की लकड़ी | मुरिया, दंडामि माड़िया | बस्तर, सरगुजा |
| बांस शिल्प | बांस | कमार, बिरहोर, कंडरा | नारायणपुर, बस्तर |
| मिट्टी शिल्प (टेराकोटा) | मिट्टी | कुम्हार समुदाय | बस्तर, रायगढ़, बिलासपुर |
| तुमा शिल्प | सूखी लौकी (तुमा) | गोंड, अबूझमाड़िया | बस्तर |
3. धातु शिल्प का विस्तृत विश्लेषण
धातुओं को पिघलाकर और ढालकर जीवंत रूप देना छत्तीसगढ़ की शिल्प कला की सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध विधाओं में से एक है। यह कला न केवल कारीगरों के कौशल को दर्शाती है, बल्कि जनजातीय आस्थाओं और विश्वासों को भी साकार करती है।
A. ढोकरा शिल्प (घड़वा कला)
ढोकरा शिल्प, जिसे बस्तर में ‘घड़वा कला’ के नाम से भी जाना जाता है, एक विश्व प्रसिद्ध धातु शिल्प है जिसकी जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता तक जाती हैं। यह छत्तीसगढ़ की शिल्प कला का सबसे बड़ा वैश्विक ब्रांड एंबेसडर है।
- परिचय और इतिहास: यह एक अलौह धातु (Non-ferrous metal) शिल्प है जो लगभग 4000 वर्ष पुरानी ‘मोम-क्षय पद्धति’ पर आधारित है। ‘घड़वा’ शब्द का अर्थ है ‘गढ़ना’ या ‘बनाना’।
-
निर्माण प्रक्रिया (मोम-क्षय पद्धति – Lost-Wax Casting):
- कारीगर सबसे पहले मधुमक्खी के मोम (Bee-wax) से मनचाही आकृति बनाते हैं।
- इस मोम की आकृति पर मिट्टी का लेप लगाकर उसे सुखाया जाता है।
- सूखने पर इसे गर्म किया जाता है, जिससे अंदर का सारा मोम पिघलकर बाहर निकल जाता है और मिट्टी के अंदर एक खोखला साँचा बन जाता है।
- इसी साँचे में पीतल, कांसा या रांगा जैसी पिघली हुई धातु को भरा जाता है।
- धातु के ठंडा होने पर मिट्टी की परत को तोड़कर अंदर से ठोस धातु की कलाकृति निकाल ली जाती है। इस प्रक्रिया में साँचा टूट जाता है, इसलिए प्रत्येक ढोकरा कलाकृति अद्वितीय होती है।
- संबंधित समुदाय: इस कला के कारीगर ‘घड़वा’ समुदाय के होते हैं, जो मुख्य रूप से बस्तर और कोंडागांव में हैं। रायगढ़ क्षेत्र में ‘झारा’ समुदाय भी इसी कला से जुड़ा है।
- प्रमुख केंद्र: कोंडागांव को ‘शिल्पग्राम’ के रूप में जाना जाता है और यह ढोकरा कला का सबसे बड़ा केंद्र है। इसके अलावा बस्तर और रायगढ़ भी प्रमुख केंद्र हैं।
- प्रमुख कलाकार: जयदेव बघेल इस कला के एक प्रसिद्ध राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कलाकार थे।
रिवीजन फैक्ट:
ढोकरा कला की कुंजी: ‘मोम-क्षय पद्धति’ (Lost-Wax Casting)। इस प्रक्रिया में साँचा टूट जाता है, इसलिए हर कृति अपने आप में अनूठी होती है।
B. लौह शिल्प
लौह शिल्प, जिसे ‘पिटवा लोहा कला’ भी कहते हैं, बस्तर की अगरिया जनजाति की एक अनूठी कला है, जिसमें वे अनुपयोगी लोहे के टुकड़ों को पीट-पीटकर जीवंत कलाकृतियों में बदल देते हैं।
- परिचय और इतिहास: अगरिया जनजाति परंपरागत रूप से लौह अयस्क से लोहा निकालने का काम करती थी। यही पारंपरिक ज्ञान अब कला के रूप में विकसित हो गया है।
- निर्माण प्रक्रिया: इसमें कारीगर लोहे के टुकड़ों को भट्टी में गर्म करके लाल करते हैं और फिर हथौड़े से पीट-पीटकर उन्हें वांछित आकार देते हैं। इसमें वेल्डिंग का उपयोग नहीं होता; सभी हिस्सों को गर्म लोहे को मोड़कर और कीलों से जोड़कर बनाया जाता है।
- विषयवस्तु: लौह शिल्प की कलाकृतियाँ मुख्य रूप से जनजातीय देवी-देवताओं, स्थानीय जानवरों (जैसे हिरण, हाथी), पक्षियों, पेड़-पौधों और दैनिक जीवन के दृश्यों को दर्शाती हैं।
- संबंधित जनजाति: यह कला मुख्य रूप से अगरिया जनजाति से जुड़ी है, लेकिन बस्तर के गोंड कारीगर भी इसमें निपुण हैं।
- प्रमुख केंद्र: कोंडागांव और बस्तर के छोटे गांव इस कला के प्रमुख केंद्र हैं।
इंटरलिंकिंग सुझाव: छत्तीसगढ़ के धातु शिल्पों की जड़ें यहाँ के समृद्ध खनिज संसाधनों में हैं। अधिक जानने के लिए हमारा खनिज पर विस्तृत लेख पढ़ें।
4. काष्ठ शिल्प का विस्तृत विश्लेषण
छत्तीसगढ़ के घने वन, विशेषकर सागौन और शीशम जैसी कीमती लकड़ियाँ, यहाँ की समृद्ध काष्ठ शिल्प परंपरा का आधार हैं। यह कला सिर्फ फर्नीचर बनाना नहीं, बल्कि लकड़ी पर भावनाओं, आस्थाओं और कहानियों को उकेरना है। छत्तीसगढ़ की शिल्प कला में काष्ठ शिल्प का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
- परिचय और इतिहास: काष्ठ शिल्प की परंपरा छत्तीसगढ़ में सदियों पुरानी है। इसका सबसे उत्कृष्ट रूप बस्तर की मुरिया जनजाति के ‘घोटुल’ के नक्काशीदार स्तंभों और दरवाजों में देखने को मिलता है।
- निर्माण प्रक्रिया: कारीगर छेनी, हथौड़ी और अन्य पारंपरिक औजारों का उपयोग करके लकड़ी के एक टुकड़े पर जटिल डिजाइन और आकृतियाँ उकेरते हैं।
-
विषयवस्तु:
- जनजातीय जीवन: काष्ठ शिल्प में मुख्य रूप से जनजातीय जीवन के दृश्यों, उनके देवी-देवताओं, नृत्य करते समूहों और दैनिक गतिविधियों को दर्शाया जाता है।
- घोटुल स्तंभ: मुरिया जनजाति के घोटुल के स्तंभों पर की गई नक्काशी विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसमें घोटुल की गतिविधियों और मिथकों का चित्रण होता है।
- मुखौटे (Masks): विभिन्न अनुष्ठानों और लोकनाट्यों के लिए लकड़ी के कलात्मक मुखौटे भी बनाए जाते हैं।
- संबंधित जनजाति: बस्तर की मुरिया जनजाति काष्ठ शिल्प में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इसके अलावा, सरगुजा क्षेत्र के कारीगर भी लकड़ी के फर्नीचर और सजावटी वस्तुओं के लिए जाने जाते हैं।
- प्रमुख केंद्र: बस्तर काष्ठ शिल्प का सबसे बड़ा और सबसे प्रसिद्ध केंद्र है। सरगुजा भी अपने काष्ठ शिल्प के लिए जाना जाता है।
रिवीजन फैक्ट:
काष्ठ शिल्प की आत्मा: बस्तर की मुरिया जनजाति और उनका युवा गृह ‘घोटुल’। घोटुल के नक्काशीदार स्तंभ और दरवाजे छत्तीसगढ़ी काष्ठ शिल्प के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं।
5. बांस, मिट्टी एवं अन्य शिल्प कलाएं
धातु और लकड़ी के अलावा, छत्तीसगढ़ की शिल्प कला में बांस, मिट्टी और लौकी जैसी प्राकृतिक सामग्रियों का भी बहुतायत से उपयोग होता है, जो यहाँ के कारीगरों की रचनात्मकता को दर्शाता है।
A. बांस शिल्प
बांस, जिसे ‘हरा सोना’ भी कहा जाता है, छत्तीसगढ़ के जनजातीय जीवन का एक अभिन्न अंग है। बांस शिल्प यहाँ की सबसे व्यापक और उपयोगी कलाओं में से एक है।
- निर्माण और उपयोग: बांस का उपयोग टोकरियाँ, सूपा, चटाई, मछली पकड़ने के जाल (टोपियाँ), फर्नीचर, और घर की दीवारें बनाने के लिए किया जाता है।
- संबंधित जनजाति: कमार जनजाति बांस शिल्प में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इसके अलावा, बिरहोर और कंडरा समुदाय भी इस कला में निपुण हैं।
- प्रमुख केंद्र: नारायणपुर जिला अपने उत्कृष्ट बांस शिल्प के लिए पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध है।
B. मिट्टी शिल्प (टेराकोटा)
मिट्टी शिल्प या टेराकोटा, मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन कलाओं में से एक है, और छत्तीसगढ़ में यह परंपरा आज भी जीवित है।
- निर्माण और उपयोग: कुम्हार समुदाय द्वारा चाक पर मिट्टी के बर्तन, दीये, सजावटी मूर्तियाँ और मन्नत की मूर्तियाँ (जैसे हाथी, घोड़े) बनाई जाती हैं, जिन्हें फिर आग में पकाया जाता है।
- प्रमुख केंद्र: बस्तर, रायगढ़ और बिलासपुर इस कला के प्रमुख केंद्र हैं। बस्तर की टेराकोटा कला अपनी अनूठी शैली के लिए जानी जाती है।
C. तुमा शिल्प (लौकी कला)
तुमा शिल्प, सूखी लौकी का उपयोग करके उपयोगी और कलात्मक वस्तुएं बनाने की एक अनूठी कला है, जो बस्तर क्षेत्र में प्रचलित है।
- निर्माण और उपयोग: गोल और लंबी लौकी (तुमा) को सुखाकर उसके खोल का उपयोग पानी रखने के बर्तन, वाद्ययंत्र (जैसे तंबूरा का निचला हिस्सा) और सजावटी लैंप बनाने के लिए किया जाता है। कारीगर इस पर सुंदर चित्रकारी और नक्काशी भी करते हैं।
- संबंधित जनजाति: यह कला मुख्य रूप से बस्तर की गोंड और अबूझमाड़िया जनजातियों द्वारा प्रचलित है।
इंटरलिंकिंग सुझाव: इन शिल्पों का उपयोग अक्सर छत्तीसगढ़ के पर्व एवं त्यौहारों में होता है। हमारे त्यौहारों पर विस्तृत लेख पढ़कर इनके सांस्कृतिक महत्व को और जानें।
6. विश्लेषण: शिल्प कला और ग्रामीण अर्थव्यवस्था
छत्तीसगढ़ की शिल्प कला सिर्फ एक सांस्कृतिक विरासत नहीं है, बल्कि यह राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ भी है। यह कलाएं कई मायनों में राज्य के विकास में योगदान करती हैं:
- ग्रामीण रोजगार: यह कलाएं हजारों जनजातीय और ग्रामीण परिवारों के लिए आजीविका का एक प्रमुख स्रोत हैं, जो उन्हें स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करके आय अर्जित करने का अवसर देती हैं।
- ‘वोकल फॉर लोकल’ को बढ़ावा: ढोकरा और लौह शिल्प जैसी कलाओं की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मांग है, जो ‘मेड इन छत्तीसगढ़’ उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाती है।
- सांस्कृतिक पर्यटन का आधार: पर्यटक अक्सर इन अनूठी कलाकृतियों को खरीदने और कारीगरों को काम करते देखने के लिए बस्तर और कोंडागांव जैसे क्षेत्रों की यात्रा करते हैं, जिससे पर्यटन को बढ़ावा मिलता है।
- सरकारी संरक्षण: छत्तीसगढ़ हस्तशिल्प विकास बोर्ड (Chhattisgarh Handicrafts Development Board) इन कलाओं को संरक्षित करने, कारीगरों को प्रशिक्षण देने और उनके उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- शबरी एम्पोरियम: इसी बोर्ड के तहत, राज्य के प्रमुख शहरों और देश के बाहर भी ‘शबरी’ ब्रांड नाम से एम्पोरियम चलाए जाते हैं, जो इन हस्तशिल्पों के लिए एक आधिकारिक बिक्री केंद्र के रूप में कार्य करते हैं।
7. परीक्षा फोकस: प्रीलिम्स vs मेन्स
प्रीलिम्स (Prelims) के लिए मुख्य तथ्य:
- शिल्प और जनजाति/समुदाय का मिलान: ढोकरा-घड़वा, लौह शिल्प-अगरिया, काष्ठ शिल्प-मुरिया, बांस शिल्प-कमार।
- निर्माण प्रक्रिया: ‘मोम-क्षय पद्धति’ (Lost-Wax Casting) किस कला से संबंधित है? (ढोकरा)।
- प्रमुख केंद्र: शिल्पग्राम (कोंडागांव), बांस शिल्प (नारायणपुर)।
- प्रमुख कलाकार: जयदेव बघेल (ढोकरा)।
मेन्स (Mains) के लिए मुख्य अवधारणाएं:
- ढोकरा शिल्प पर एक विस्तृत नोट: इसकी निर्माण प्रक्रिया, विषयवस्तु और सांस्कृतिक महत्व पर चर्चा करें।
- छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में हस्तशिल्प की भूमिका: विश्लेषण करें कि यह कलाएं कैसे रोजगार सृजन और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में मदद करती हैं।
- बस्तर को ‘छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक हृदय’ क्यों कहा जाता है?: इसके उत्तर में ढोकरा, लौह शिल्प, काष्ठ शिल्प और तुमा शिल्प का उदाहरण देते हुए समझाएं।
स्मार्ट रिवीज़न हैक्स: शिल्प कलाओं को आसानी से कैसे याद रखें?
छत्तीसगढ़ की इतनी सारी शिल्प कलाओं, उनसे जुड़ी जनजातियों और स्थानों को याद रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यहाँ कुछ सरल तकनीकें हैं जो आपकी मदद करेंगी:
1. माध्यम के अनुसार कहानी बनाएं:
- धातु (Metal): सोचें कि धातु का काम दो तरह का है – एक ‘ढालकर’ (ढोकरा) और दूसरा ‘पीटकर’ (लौह)। ढोकरा बनाने वाले ‘घड़वा’ कहलाए। लोहा पीटने का काम ‘अगरिया’ करते हैं क्योंकि वे ‘आग’ का इस्तेमाल करते हैं।
- प्राकृतिक (Natural): सोचें कि जंगल से क्या-क्या मिलता है – लकड़ी (काष्ठ), बांस, और लौकी (तुमा)। लकड़ी पर नक्काशी ‘मुरिया’ जनजाति करती है। बांस का काम ‘कमार’ करते हैं। और तुमा (लौकी) का उपयोग बस्तर की जनजातियाँ करती हैं।
2. स्मृति-सहायक तकनीक (Mnemonics) का प्रयोग करें:
- “कोंडागांव के शिल्पग्राम में जयदेव ने ढोकरा बनाया”: इससे आपको याद रहेगा कि कोंडागांव को शिल्पग्राम कहते हैं, जयदेव बघेल ढोकरा कला के कलाकार थे।
- “अगरिया आग में लोहा पीटता है”: यह आपको अगरिया जनजाति और लौह शिल्प को एक साथ याद रखने में मदद करेगा।
- “नारायण के हाथ में बांस”: यह आपको याद दिलाएगा कि नारायणपुर बांस शिल्प के लिए प्रसिद्ध है।
3. एक अनोखा तथ्य याद रखें:
याद रखें कि ढोकरा कला की हर कृति अद्वितीय होती है क्योंकि उसकी निर्माण प्रक्रिया (मोम-क्षय पद्धति) में साँचा टूट जाता है। यह तथ्य आपको इस कला की सबसे बड़ी विशेषता याद रखने में मदद करेगा।
8. निष्कर्ष
अंततः, छत्तीसगढ़ की शिल्प कला यहाँ के लोगों की रचनात्मकता, résilience और प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध का एक जीवंत प्रमाण है। यह एक ऐसी कला है जो मिट्टी, धातु, लकड़ी और बांस जैसी साधारण वस्तुओं में जान फूंक देती है। ये कलाकृतियाँ सिर्फ सजावट का सामान नहीं, बल्कि सदियों की परंपरा, आस्था और ज्ञान का खजाना हैं। एक छात्र के लिए, इन शिल्पों को समझना सिर्फ परीक्षा के अंक हासिल करना नहीं, बल्कि उस हुनर को सम्मान देना है जो छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को गढ़ता है।
अगला कदम: अब जब आपने छत्तीसगढ़ की शिल्प कला को समझ लिया है, तो हमारी उत्सव, शिल्प एवं जीवनशैली श्रेणी में जाकर जानें कि इन शिल्पों से बने आभूषण और यहाँ की पारंपरिक वेशभूषा कैसी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: ढोकरा कला की सबसे अनूठी विशेषता क्या है?
ढोकरा कला की सबसे अनूठी विशेषता इसकी ‘मोम-क्षय पद्धति’ (Lost-Wax Casting) है। इस प्रक्रिया में कलाकृति बनाने के लिए उपयोग किया जाने वाला मिट्टी का साँचा टूट जाता है, इसलिए प्रत्येक ढोकरा कलाकृति अपने आप में अद्वितीय होती है और उसकी कोई दूसरी प्रति नहीं बनाई जा सकती।
प्रश्न 2: लौह शिल्प और ढोकरा शिल्प में क्या मुख्य अंतर है?
मुख्य अंतर धातु और निर्माण प्रक्रिया का है। ढोकरा शिल्प में पीतल या कांसे जैसी अलौह धातुओं को पिघलाकर साँचे में ढाला जाता है। इसके विपरीत, लौह शिल्प में लोहे को गर्म करके हथौड़े से पीट-पीटकर आकार दिया जाता है।
प्रश्न 3: छत्तीसगढ़ की कौन सी जनजाति काष्ठ शिल्प के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है?
बस्तर की मुरिया जनजाति को काष्ठ शिल्प में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। उनके द्वारा बनाए गए घोटुल के नक्काशीदार स्तंभ, मुखौटे और स्मृति स्तंभ इस कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
प्रश्न 4: ‘शिल्पग्राम’ की संज्ञा किस स्थान को दी गई है?
कोंडागांव जिले को ‘शिल्पग्राम’ की संज्ञा दी गई है क्योंकि यह ढोकरा, लौह शिल्प, काष्ठ शिल्प और अन्य कई हस्तशिल्पों का एक प्रमुख केंद्र है।
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