प्रोजेक्ट चीता: भारत में चीतों की वापसी – एक सम्पूर्ण विश्लेषण

📝 परिचय
भारत के वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में 17 सितंबर 2022 का दिन सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया, जब 70 से अधिक वर्षों के अंतराल के बाद चीतों ने एक बार फिर भारतीय धरती पर कदम रखा। “प्रोजेक्ट चीता” केवल एक वन्यजीव स्थानांतरण परियोजना नहीं है, बल्कि यह भारत की पारिस्थितिक पुनर्स्थापना, जैव विविधता के प्रति प्रतिबद्धता और एक महत्वाकांक्षी सपने का प्रतीक है। यह लेख ‘प्रोजेक्ट चीता’ पर एक सम्पूर्ण गाइड है, जिसमें हम इसके ऐतिहासिक संदर्भ से लेकर नवीनतम घटनाओं, वैज्ञानिक पहलुओं, चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं तक, हर पहलू का गहन विश्लेषण करेंगे, जो प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रकृति प्रेमियों दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी होगा।

विषय सूची [x]

प्रोजेक्ट चीता का ऐतिहासिक संदर्भ: भारत से क्यों और कैसे विलुप्त हुए चीते?

एक समय था जब चीता भारत की शान था

आज भारत में चीतों को फिर से बसाने की जो कवायद हो रही है, उसे समझने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटना जरूरी है। एक समय था जब चीता भारतीय grasslands (घास के मैदानों) और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में दूर-दूर तक फैला हुआ था। मुगल बादशाह, विशेषकर अकबर, चीतों को पालतू बनाने और उनका उपयोग शिकार, विशेषकर काले हिरण (blackbuck) के शिकार के लिए करने के लिए जाने जाते थे। लेकिन 19वीं और 20वीं सदी में स्थिति तेजी से बदली।

विलुप्त होने के प्रमुख कारण

भारत से चीतों के विलुप्त होने का कोई एक कारण नहीं था, बल्कि यह कई कारकों का परिणाम था:
  • अंधाधुंध शिकार: ब्रिटिश शासन के दौरान और उसके बाद भारतीय रजवाड़ों द्वारा चीतों का बड़े पैमाने पर शिकार किया गया। इसे वीरता का प्रतीक माना जाता था, और इनाम के लिए भी इनका शिकार होता था।
  • आवास का विनाश: कृषि और बस्तियों के विस्तार के कारण घास के मैदानों और जंगलों का तेजी से सफाया हुआ, जिससे चीतों का प्राकृतिक आवास छिन गया।
  • शिकार की कमी: चीतों के मुख्य शिकार, जैसे कि काले हिरण और चिंकारा, की संख्या में कमी आने से उनके लिए भोजन का संकट उत्पन्न हो गया।
  • प्रजनन में विफलता: चीतों को कैद में रखकर उनका प्रजनन कराना बहुत मुश्किल होता है। चूँकि शिकार के लिए बड़ी संख्या में चीतों को जंगल से पकड़ा जाता था, इसलिए जंगल में उनकी आबादी स्वाभाविक रूप से फिर से पनप नहीं पाई।
🔥 एक दुखद अंत: भारत के आखिरी चीते
यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत में आखिरी तीन चीतों का शिकार 1947 में अविभाजित मध्य प्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) की रियासत कोरिया के महाराजा रामानुज प्रताप सिंह देव द्वारा किया गया था। इसके बाद, 1952 में भारत सरकार द्वारा चीतों को आधिकारिक तौर पर देश में विलुप्त (Extinct) घोषित कर दिया गया।

चीता: एक परिचय (त्वरित रिविज़न फैक्ट शीट)

प्रोजेक्ट चीता को पूरी तरह से समझने से पहले, आइए इस शानदार जीव के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को जानें, जो प्रतियोगी परीक्षाओं के वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
🔥 चीता प्रोफाइल: परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
तथ्यविवरण
वैज्ञानिक नामAcinonyx jubatus
IUCN रेड लिस्ट स्थितिVulnerable (असुरक्षित)
पहचानशरीर पर ठोस काले धब्बे; आँखों के कोने से मुँह तक एक विशिष्ट काली “आँसू की रेखा” (Tear Line) होती है जो इसे तेंदुए से अलग करती है।
शीर्ष गति100 से 120 किलोमीटर प्रति घंटा (पृथ्वी पर सबसे तेज दौड़ने वाला जमीनी जानवर)।
आहारमुख्य रूप से छोटे से मध्यम आकार के शाकाहारी, जैसे चिंकारा, काले हिरण, और खरगोश।
शिकार की तकनीकबाघों और तेंदुओं की तरह छिपकर हमला नहीं करता, बल्कि अपनी असाधारण गति का उपयोग करके शिकार का पीछा करता है।
भारत में विलुप्त घोषित1952

प्रोजेक्ट चीता: एक महत्वाकांक्षी सपने का जन्म

परियोजना की अवधारणा और उद्देश्य

भारत से चीतों के विलुप्त होने के बाद, उन्हें वापस लाने के विचार पर दशकों तक चर्चा होती रही। अंततः, 21वीं सदी में इस विचार ने एक ठोस परियोजना का रूप लिया, जिसे “प्रोजेक्ट चीता” के नाम से जाना गया। यह दुनिया की पहली अंतर-महाद्वीपीय (inter-continental) वन्यजीव स्थानांतरण परियोजना है।इस महत्वाकांक्षी परियोजना के कई व्यापक उद्देश्य हैं, जो सिर्फ चीतों को फिर से बसाने तक सीमित नहीं हैं:
  • पारिस्थितिक संतुलन की बहाली: चीता घास के मैदानों की खाद्य श्रृंखला (food chain) में एक शीर्ष शिकारी (top predator) की भूमिका निभाता है। उसकी वापसी से इन पारिस्थितिक तंत्रों के संतुलन को बहाल करने में मदद मिलेगी।
  • जैव विविधता का संरक्षण: चीते एक “अम्ब्रेला प्रजाति” (umbrella species) हैं। उनके संरक्षण के लिए घास के मैदानों और अन्य प्रजातियों (जैसे चिंकारा, काले हिरण) का संरक्षण भी आवश्यक हो जाता है, जिससे पूरी जैव विविधता को लाभ मिलता है।
  • इको-टूरिज्म को बढ़ावा: चीतों की उपस्थिति से कूनो नेशनल पार्क और आसपास के क्षेत्रों में इको-टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा, जिससे स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
  • वैश्विक संरक्षण प्रयासों में योगदान: इस परियोजना की सफलता या विफलता से दुनिया भर के संरक्षण वैज्ञानिक महत्वपूर्ण सबक सीखेंगे, जो भविष्य की अन्य स्थानांतरण परियोजनाओं के लिए मार्गदर्शक का काम करेंगे।

अफ्रीकी चीता ही क्यों?

कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि भारत में एशियाई चीतों (जो अब केवल ईरान में पाए जाते हैं) के बजाय अफ्रीकी चीतों को क्यों लाया गया।
  1. आबादी का संकट: ईरान में एशियाई चीतों की संख्या 50 से भी कम है और वे आनुवंशिक रूप से बहुत कमजोर हैं। इतनी छोटी आबादी से किसी भी चीते को स्थानांतरित करना संभव नहीं था।
  2. आनुवंशिक समानता: वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि अफ्रीकी और एशियाई चीतों में बहुत अधिक आनुवंशिक समानता है, और वे हजारों साल पहले ही एक-दूसरे से अलग हुए थे। इसलिए, अफ्रीकी चीतों का भारतीय वातावरण में ढलना संभव माना गया।

चीतों का स्थानांतरण: एक अंतर-महाद्वीपीय महाअभियान

पहला चरण (सितंबर 2022): नामीबिया से कूनो तक

70 साल के लंबे इंतजार के बाद, प्रोजेक्ट चीता ने 17 सितंबर 2022 को वास्तविकता का रूप लिया, जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन भी था। इस ऐतिहासिक दिन, नामीबिया से 8 अफ्रीकी चीतों (5 मादा और 3 नर) के पहले जत्थे को एक विशेष बोइंग 747 विमान द्वारा भारत लाया गया। ग्वालियर में उतरने के बाद, उन्हें हेलीकॉप्टरों द्वारा मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क (KNP) में पहुंचाया गया, जहाँ प्रधानमंत्री ने स्वयं उन्हें क्वारंटाइन बाड़ों में छोड़ा। यह क्षण भारत के वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक मील का पत्थर बन गया।

दूसरा चरण (फरवरी 2023): दक्षिण अफ्रीका से जुड़ाव

परियोजना के विस्तार के दूसरे चरण में, 18 फरवरी 2023 को दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीतों (7 नर और 5 मादा) को भारत लाया गया। इन्हें भी कूनो नेशनल पार्क में ही बसाया गया। इस दूसरे जत्थे का उद्देश्य कूनो में चीतों के आनुवंशिक पूल (genetic pool) को और अधिक विविध बनाना और एक आत्मनिर्भर आबादी स्थापित करने की संभावनाओं को बढ़ाना था।
स्थानांतरण का चरणदेशआगमन की तिथिलाए गए चीतों की संख्या
पहला चरणनामीबिया17 सितंबर 20228 (5 मादा, 3 नर)
दूसरा चरणदक्षिण अफ्रीका18 फरवरी 202312 (7 नर, 5 मादा)

अब तक का सफर (नवंबर 2025 तक): चुनौतियों पर विजय पाती उम्मीदें

प्रोजेक्ट चीता की यात्रा किसी रोमांचक कहानी से कम नहीं रही है, जिसमें शावकों के जन्म की अपार खुशियों के साथ-साथ कई चीतों की असामयिक मृत्यु की दुखद चुनौतियाँ भी शामिल हैं। हालांकि, नवंबर 2025 तक के नवीनतम आँकड़े परियोजना के सकारात्मक दिशा में बढ़ने का एक मजबूत संकेत देते हैं।

सबसे बड़ी खुशखबरी: ‘मुहकी’ ने रचा इतिहास, दूसरी पीढ़ी का आगमन

प्रोजेक्ट चीता के लिए सबसे बड़ी और ऐतिहासिक सफलता **20 नवंबर 2025** को मिली, जब भारत में जन्मी एक मादा चीता **’मुहकी’** ने कूनो नेशनल पार्क में 5 स्वस्थ शावकों को जन्म दिया।
  • क्यों है यह खास?: यह पहली बार है जब भारत में जन्मी किसी चीता ने शावकों को जन्म दिया है। यह “दूसरी पीढ़ी” का पहला लिटर है, जो इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि चीते न केवल कूनो के वातावरण में ढल रहे हैं, बल्कि सफलतापूर्वक प्रजनन भी कर रहे हैं।
  • क्या हैं मायने?: यह मील का पत्थर परियोजना के आलोचकों को एक मजबूत जवाब देता है और भारत में चीतों की एक आत्मनिर्भर आबादी स्थापित होने की उम्मीदों को प्रबल करता है। यह UPSC GS-3 (पर्यावरण) में जैव विविधता पुनर्स्थापना (Biodiversity Restoration) के एक सफल केस स्टडी के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

नवीनतम आँकड़े: नवंबर 2025 तक की स्थिति

आइए, नवीनतम आँकड़ों के माध्यम से प्रोजेक्ट चीता की वर्तमान स्थिति को विस्तार से समझते हैं। ये आँकड़े NTCA (राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण) की रिपोर्ट्स और विश्वसनीय समाचार स्रोतों पर आधारित हैं।
मानदंड (Parameter)विवरणस्रोत/टिप्पणी
कुल चीतों की संख्या32 (कूनो में 29, गांधी सागर में 3)NTCA अपडेट्स
भारत में जन्मे चीते19 (कुल 32 में से)Swarajya मैगज़ीन
कुल आयातित चीते20 (8 नामीबिया से + 12 दक्षिण अफ्रीका से)NTCA
कुल मृत्यु (2022-2025)आयातित 20 में से 9-10 वयस्क; लगभग 5-7 शावकNTCA, Business Standard
जीवित रहने की दर (Survival Rate)प्रथम वर्ष: ~70%; द्वितीय वर्ष: ~85.7%New Indian Express

आँकड़ों का विश्लेषण:

उपरोक्त तालिका दर्शाती है कि शुरुआती असफलताओं के बावजूद, प्रोजेक्ट चीता अब स्थिरता की ओर बढ़ रहा है। भारत में जन्मे 19 चीतों का होना यह दिखाता है कि परियोजना प्रजनन के दृष्टिकोण से सफल हो रही है। लगभग 70-85% की जीवित रहने की दर को विशेषज्ञ अंतर-महाद्वीपीय स्थानांतरण परियोजनाओं के लिए एक अच्छा संकेत मानते हैं।

चुनौतियाँ और मृत्यु: एक संतुलित दृष्टिकोण

यह स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि परियोजना ने कई गंभीर चुनौतियों का सामना किया है, जिसमें आयातित 20 चीतों में से लगभग आधे की मृत्यु हो चुकी है।
  • मृत्यु के कारण: शुरुआती मौतों के मुख्य कारण किडनी संबंधी समस्याएं, आपसी संघर्ष, और रेडियो कॉलर से हुआ सेप्टीसीमिया संक्रमण थे। कुछ शावकों की मृत्यु अत्यधिक गर्मी और डिहाइड्रेशन से भी हुई।
  • विवाद और आलोचना: कुछ वन्यजीव विशेषज्ञों (जैसे Frontiers जर्नल में प्रकाशित लेख) ने परियोजना के प्रबंधन और सॉफ्ट रिलीज बाड़ों में हुई मौतों पर सवाल उठाए हैं।
  • सरकार का पक्ष: NTCA और पर्यावरण मंत्रालय ने इन मौतों को “प्राकृतिक समायोजन प्रक्रिया” का हिस्सा बताया है और स्पष्ट किया है कि 2025 में किसी भी वयस्क चीते की कोई नई मौत रिपोर्ट नहीं हुई है। NTCA की रिपोर्ट के अनुसार, बीमारियों के जोखिम का विश्लेषण करने पर कोई भी मौत लापरवाही से जुड़ी नहीं पाई गई।
यह बहस दर्शाती है कि इस तरह की जटिल परियोजनाओं में सफलता और विफलता को मापना कितना चुनौतीपूर्ण है।

वैज्ञानिक और पारिस्थितिक विश्लेषण: कूनो ही क्यों और क्या हैं खतरे?

प्रोजेक्ट चीता की सफलता केवल चीतों को भारत लाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करती है कि वे अपने नए घर में कैसे ढलते हैं, शिकार करते हैं, और अपनी आबादी बढ़ाते हैं। इसके लिए सही स्थान का चुनाव और पारिस्थितिक चुनौतियों को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

कूनो नेशनल पार्क ही क्यों चुना गया?

भारत में चीतों को फिर से बसाने के लिए कई संभावित स्थलों का सर्वेक्षण किया गया, लेकिन अंततः मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क (KNP) को कई कारणों से सबसे उपयुक्त पाया गया:
  • उपयुक्त आवास (Habitat): कूनो में सवाना-जैसे विशाल घास के मैदान (grasslands) और हल्के-फुल्के जंगल हैं, जो चीतों के रहने और शिकार करने के लिए एक आदर्श वातावरण प्रदान करते हैं।
  • शिकार का पर्याप्त आधार (Prey Base): पार्क में चीतल (चित्तीदार हिरण), सांभर, नीलगाय, और जंगली सूअर जैसे शाकाहारी जानवरों की एक अच्छी आबादी है, जो चीतों के लिए एक स्थायी भोजन स्रोत सुनिश्चित करती है।
  • मानवीय हस्तक्षेप की कमी: कूनो के कोर क्षेत्र में कोई भी मानवीय गाँव नहीं है, जिससे चीतों और मनुष्यों के बीच संघर्ष की संभावना कम हो जाती है। पार्क के बफर जोन से भी कई गाँवों को सफलतापूर्वक विस्थापित किया जा चुका है।
  • विस्तार की क्षमता: कूनो का क्षेत्रफल लगभग 748 वर्ग किलोमीटर है और इसके चारों ओर 1,235 वर्ग किलोमीटर का वन क्षेत्र है, जो चीतों की आबादी बढ़ने पर उन्हें फैलने के लिए पर्याप्त जगह प्रदान करता है।

अफ्रीकी बनाम एशियाई चीता: एक वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य

भारत में अफ्रीकी चीतों को लाने के निर्णय पर कुछ विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं। आइए, इन दोनों के बीच के अंतर और समानता को समझें।
तुलना का आधारएशियाई चीता (Acinonyx jubatus venaticus)अफ्रीकी चीता (Acinonyx jubatus jubatus)
वर्तमान स्थितिगंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered)असुरक्षित (Vulnerable)
आबादी50 से भी कम (केवल ईरान में)लगभग 7,000
शारीरिक बनावटअफ्रीकी चीते की तुलना में छोटा और पतलाएशियाई चीते की तुलना में बड़ा और मजबूत
आनुवंशिक अंतरबहुत कम, हजारों साल पहले ही अलग हुएबहुत कम
जैसा कि तालिका से स्पष्ट है, एशियाई चीतों की अत्यंत कम आबादी के कारण उन्हें स्थानांतरित करना संभव नहीं था। वैज्ञानिक मानते हैं कि दोनों उप-प्रजातियों के बीच आनुवंशिक अंतर इतना कम है कि अफ्रीकी चीते भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल ढल सकते हैं।

संरक्षण परियोजनाओं की तुलना: चीता बनाम बाघ

भारत में वन्यजीव संरक्षण का सबसे सफल उदाहरण “प्रोजेक्ट टाइगर” है। हालांकि, प्रोजेक्ट चीता कई मायनों में इससे अलग और अधिक चुनौतीपूर्ण है।
🔥 प्रोजेक्ट चीता बनाम प्रोजेक्ट टाइगर: मुख्य अंतर
  1. प्रजाति का प्रकार: प्रोजेक्ट टाइगर का उद्देश्य देश में पहले से मौजूद (in-situ conservation) बाघों की आबादी को बढ़ाना था। इसके विपरीत, प्रोजेक्ट चीता एक विलुप्त हो चुकी प्रजाति को बाहर से लाकर फिर से बसाने (reintroduction) का कार्यक्रम है, जो कहीं अधिक जटिल है।
  2. आवास की प्रकृति: बाघ घने जंगलों में रहते हैं और छिपकर शिकार करते हैं। चीते खुले घास के मैदानों में रहते हैं और अपनी गति से शिकार करते हैं। इसलिए, चीतों को बहुत बड़े और खुले क्षेत्रों की आवश्यकता होती है।
  3. सामाजिक व्यवहार: बाघ आमतौर पर अकेले रहते हैं, जबकि चीतों का सामाजिक व्यवहार अधिक जटिल होता है, जिसमें नर गठबंधन (coalitions) बनाते हैं।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि प्रोजेक्ट चीता की सफलता को प्रोजेक्ट टाइगर के पैमाने पर नहीं मापा जाना चाहिए। यह एक दीर्घकालिक पारिस्थितिक प्रयोग है, जिसकी सफलता या विफलता से भविष्य के लिए महत्वपूर्ण सबक मिलेंगे।

परियोजना का मानवीय और वित्तीय पहलू: लागत और समुदाय

प्रोजेक्ट चीता केवल चीतों और पारिस्थितिकी के बारे में नहीं है; इसका एक महत्वपूर्ण मानवीय और वित्तीय आयाम भी है, जिसे समझना इस परियोजना की पूरी तस्वीर को देखने के लिए आवश्यक है।

परियोजना की वित्तीय लागत

यह एक स्वाभाविक प्रश्न है कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर कितना खर्च हो रहा है।
  • अनुमानित बजट: प्रोजेक्ट चीता के लिए केंद्र सरकार ने 2021-22 से 2025-26 की अवधि के लिए ₹38.70 करोड़ का बजट आवंटित किया है। इसके अलावा, राज्य सरकारें और विभिन्न कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (CSR) फंड्स भी इसमें योगदान करते हैं।
  • खर्च कहाँ होता है?: इस बजट का उपयोग चीतों के परिवहन, उनके लिए बाड़ों का निर्माण, रेडियो कॉलर, निगरानी टीमों, पशु चिकित्सकों, और शिकार के आधार (prey base) के प्रबंधन जैसे कार्यों में किया जाता है।
🔥 क्या यह लागत उचित है?
आलोचकों का तर्क है कि इतनी बड़ी राशि का उपयोग भारत की अन्य मौजूदा संकटग्रस्त प्रजातियों, जैसे कि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, के संरक्षण पर किया जा सकता था। वहीं, समर्थकों का मानना है कि यह निवेश केवल चीतों पर नहीं, बल्कि पूरे घास के मैदानों के पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने पर है, जिसके दीर्घकालिक लाभ होंगे।

मानवीय पहलू: विस्थापन और सामुदायिक भागीदारी

  • विस्थापन: कूनो नेशनल पार्क को चीतों के लिए तैयार करने के लिए, पार्क के अंदर स्थित 24 गाँवों के लगभग 1,500 परिवारों को कई साल पहले सफलतापूर्वक दूसरी जगहों पर बसाया गया था। यह भारत में वन्यजीव संरक्षण के लिए किए गए सबसे सफल विस्थापन कार्यक्रमों में से एक माना जाता है।
  • “चीता मित्र”: मानव-चीता संघर्ष को रोकने और स्थानीय समुदायों को संरक्षण में भागीदार बनाने के लिए, कूनो के आसपास के 51 गाँवों से 400 से अधिक युवाओं को “चीता मित्र” के रूप में प्रशिक्षित किया गया है। उनका काम चीतों के पार्क से बाहर निकलने पर निगरानी रखना, ग्रामीणों को सूचित करना, और वन विभाग की मदद करना है। यह पहल सामुदायिक भागीदारी का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

भविष्य की राह: प्रोजेक्ट चीता का विस्तार और आगामी योजनाएं

कूनो नेशनल पार्क में सीखे गए सबक और “मुहकी” के शावकों से मिले उत्साह के साथ, प्रोजेक्ट चीता अब विस्तार के अपने अगले चरण में प्रवेश कर रहा है, जिसका लक्ष्य एक “मेटा-पॉपुलेशन” (कई छोटी-छोटी आत्मनिर्भर आबादियाँ) बनाना है।

गांधी सागर: चीतों का दूसरा घर तैयार

कूनो पर दबाव कम करने और एक दूसरी आबादी स्थापित करने के लिए मध्य प्रदेश में ही स्थित **गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य** को दूसरे घर के रूप में तैयार किया जा चुका है।
  • वर्तमान स्थिति: नवंबर 2025 तक, 3 चीतों को सफलतापूर्वक गांधी सागर में स्थानांतरित कर दिया गया है।
  • आगे की योजना: भविष्य में कुछ और चीतों को यहाँ स्थानांतरित किया जाएगा ताकि एक नया प्रजनन केंद्र स्थापित हो सके।

बोत्सवाना से नए आगमन की तैयारी

भारत में चीतों के आनुवंशिक पूल को और अधिक मजबूत और विविध बनाने के लिए, अफ्रीकी चीतों का एक नया जत्था जल्द ही भारत आने वाला है।
  • घोषणा: 5 नवंबर 2025 को यह घोषणा की गई कि **बोत्सवाना से 8 और चीते** दिसंबर 2025 के मध्य तक भारत लाए जाएंगे।
  • चुनौती: इन चीतों को दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध में लाने पर जलवायु समायोजन एक चुनौती होगी, लेकिन NTCA ने प्री-ट्रांसलोकेशन स्वास्थ्य जांच और तैयारियों को पूरा कर लिया है।
🔥 भविष्य की अन्य योजनाएं
NTCA और WII (भारतीय वन्यजीव संस्थान) की योजनाओं में गुजरात के बन्नी घास के मैदानों और केन्या से भी भविष्य में चीतों को लाने पर विचार-विमर्श शामिल है, ताकि भारत में एक स्थायी और स्वस्थ मेटा-पॉपुलेशन का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।

सफलता बनाम विफलता: प्रोजेक्ट चीता पर विशेषज्ञों की बहस

प्रोजेक्ट चीता अपनी शुरुआत से ही वन्यजीव विशेषज्ञों और संरक्षणवादियों के बीच एक गहन बहस का विषय रहा है। एक संतुलित दृष्टिकोण के लिए, इसके पक्ष और विपक्ष दोनों के तर्कों को समझना महत्वपूर्ण है।
पक्ष में तर्क (परियोजना क्यों सफल है)विपक्ष में तर्क (चुनौतियाँ और आलोचना)
दूसरी पीढ़ी का जन्म (मुहकी) एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है, जो सफल प्रजनन का प्रमाण है।आयातित 20 चीतों में से लगभग 50% की मृत्यु दर चिंताजनक रूप से अधिक है।
अंतर-महाद्वीपीय स्थानांतरण की तकनीकी जटिलताओं में महारत हासिल करना एक बड़ी उपलब्धि है।कूनो की धारण क्षमता (carrying capacity) सीमित है और यह सभी चीतों के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है।
घास के मैदानों के पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ी है।अफ्रीकी चीतों का भारतीय परिस्थितियों में पूरी तरह से ढल पाना अभी भी एक अनिश्चितता है।
“चीता मित्र” जैसी पहलों के माध्यम से सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा मिला है।परियोजना की विशाल वित्तीय लागत का उपयोग अन्य संकटग्रस्त भारतीय प्रजातियों पर किया जा सकता था।

मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन: एक मॉडल दृष्टिकोण

UPSC और CGPSC जैसी मुख्य परीक्षाओं में “प्रोजेक्ट चीता” पर आधारित विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जाने की प्रबल संभावना है। एक प्रभावी उत्तर लिखने के लिए, आपको एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा जिसमें आप परियोजना के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं पर चर्चा करें।

मॉडल प्रश्न:

“प्रोजेक्ट चीता भारत में वन्यजीव संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी कदम है, लेकिन यह गंभीर पारिस्थितिक और प्रबंधन संबंधी चुनौतियों का भी सामना कर रहा है। आलोचनात्मक विश्लेषण करें।” (15 अंक, 250 शब्द)

🔥 उत्तर लिखने का सर्वश्रेष्ठ ढाँचा (Answer Writing Framework)

1. परिचय (Introduction) – (लगभग 30 शब्द):

उत्तर की शुरुआत प्रोजेक्ट चीता के संक्षिप्त परिचय से करें। बताएं कि यह एक विलुप्त प्रजाति को अंतर-महाद्वीपीय स्थानांतरण के माध्यम से भारत में फिर से बसाने की एक ऐतिहासिक पहल है, जिसका उद्देश्य पारिस्थितिक संतुलन को बहाल करना है।

2. पक्ष में तर्क (सकारात्मक पहलू) – (लगभग 80 शब्द):

यहाँ परियोजना के महत्व और लाभों पर चर्चा करें। बिंदुओं का उपयोग करें:

  • पारिस्थितिक महत्व: घास के मैदानों के पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और यह एक “अम्ब्रेला प्रजाति” के रूप में कैसे काम करता है।
  • जैव विविधता: इसके माध्यम से घास के मैदानों और अन्य प्रजातियों का संरक्षण।
  • आर्थिक लाभ: इको-टूरिज्म को बढ़ावा और स्थानीय रोजगार का सृजन।

3. विपक्ष में तर्क (चुनौतियाँ और आलोचना) – (लगभग 80 शब्द):

यहाँ परियोजना के सामने खड़ी चुनौतियों और आलोचनाओं का उल्लेख करें:

  • उच्च मृत्यु दर: वयस्क और शावक चीतों की मौतों का उल्लेख करें।
  • अनुकूलन की चुनौतियाँ: नए वातावरण, शिकार के पैटर्न, और बीमारियों (जैसे रेडियो कॉलर से संक्रमण) से ढलने में कठिनाई।
  • अफ्रीकी बनाम एशियाई चीते की बहस: कुछ विशेषज्ञों द्वारा उठाए गए आनुवंशिक और व्यवहार संबंधी सवालों का संक्षिप्त उल्लेख।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष: चीतों के संरक्षित क्षेत्र से बाहर निकलने की घटनाओं का उल्लेख।

4. आगे की राह (Way Forward) – (लगभग 30 शब्द):

चुनौतियों से निपटने के लिए कुछ सकारात्मक सुझाव दें, जैसे बेहतर वैज्ञानिक निगरानी, गांधी सागर जैसे दूसरे घरों का तेजी से विकास, और स्थानीय समुदायों की भागीदारी।

5. निष्कर्ष (Conclusion) – (लगभग 30 शब्द):

एक संतुलित निष्कर्ष लिखें। बताएं कि चुनौतियों के बावजूद, प्रोजेक्ट चीता एक महत्वपूर्ण संरक्षण “प्रयोग” है। इसकी सफलता या विफलता, दोनों ही भविष्य की संरक्षण परियोजनाओं के लिए अमूल्य सबक प्रदान करेगी, और इसलिए यह एक सराहनीय प्रयास है।

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अभ्यास प्रश्न

नवंबर 2025 तक, भारत में कुल चीतों की अनुमानित संख्या कितनी है?

  • विकल्प 1: 20
  • विकल्प 2: 32

भारत में जन्मी पहली मादा चीता का नाम क्या है जिसने नवंबर 2025 में 5 शावकों को जन्म दिया?

  • विकल्प 1: ज्वाला
  • विकल्प 2: आशा

भारत में चीतों को आधिकारिक तौर पर किस वर्ष विलुप्त घोषित किया गया था?

  • विकल्प 1: 1947
  • विकल्प 2: 1952

भारत में लाए गए चीतों को किस राष्ट्रीय उद्यान में बसाया गया है?

  • विकल्प 1: कान्हा राष्ट्रीय उद्यान
  • विकल्प 2: कूनो राष्ट्रीय उद्यान

“प्रोजेक्ट चीता” के तहत चीतों का स्थानांतरण दुनिया की पहली _____ वन्यजीव स्थानांतरण परियोजना है।

  • विकल्प 1: अंतर-राज्यीय (inter-state)
  • विकल्प 2: अंतर-महाद्वीपीय (inter-continental)
निष्कर्ष
प्रोजेक्ट चीता भारत की वन्यजीव संरक्षण यात्रा में एक साहसिक और ऐतिहासिक प्रयोग है। यह चुनौतियों से भरा है, और इसकी सफलता की कोई गारंटी नहीं है। चीतों की मौतें दुखद हैं, लेकिन वे इस जटिल पारिस्थितिक प्रक्रिया का एक हिस्सा भी हैं। इस परियोजना से सीखे गए सबक न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर में संरक्षण के भविष्य को आकार देंगे। यह परियोजना हमें याद दिलाती है कि प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ना आसान है, लेकिन उसे फिर से स्थापित करने के लिए दशकों के धैर्य, विज्ञान और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संदर्भ और विश्वसनीय स्रोत (References and Sources)

इस लेख में प्रस्तुत सभी जानकारी, आँकड़ों और नवीनतम अपडेट्स की सटीकता एवं प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए, हमने निम्नलिखित विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोतों का उपयोग किया है। हमारा उद्देश्य अपने पाठकों को सबसे गहन और सत्यापित जानकारी प्रदान करना है।
  • राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA): यह भारत में प्रोजेक्ट चीता के लिए आधिकारिक नोडल एजेंसी है। सभी वार्षिक रिपोर्ट, नवीनतम आँकड़े, और परियोजना से संबंधित आधिकारिक घोषणाएं इसी स्रोत पर आधारित हैं।
    https://ntca.gov.in/project-cheetah-kuno-np/
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN): चीते की वैश्विक संरक्षण स्थिति (‘Vulnerable’ या असुरक्षित) और वैज्ञानिक वर्गीकरण की जानकारी के लिए IUCN रेड लिस्ट एक प्राथमिक अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक स्रोत है।
    https://www.iucnredlist.org/species/219/215140307
  • पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC): परियोजना से संबंधित प्रमुख नीतिगत घोषणाओं और प्रेस विज्ञप्तियों के लिए भारत सरकार का यह मंत्रालय एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

📲 इस लेख को शेयर करें:

🚀 हमसे सोशल मीडिया पर जुड़ें

लेटेस्ट अपडेट्स और फ्री नोट्स के लिए फॉलो करें:

अपनी तैयारी को नई उड़ान दें!

ज्ञान और मार्गदर्शन के इस सफर में अकेला महसूस न करें। हमारे समुदाय से जुड़ें:

हमारे अन्य उपयोगी ब्लॉग्स:

Paisa Blueprint | Desh Samvad

Leave a Comment