छत्तीसगढ़ का भूगोल (Geography of Chhattisgarh): CGPSC/Vyapam हेतु संपूर्ण और विस्तृत गाइड (2025)

छत्तीसगढ़, जिसे “धान का कटोरा” और “खनिजों का गढ़” कहा जाता है, भारत का एक ऐसा राज्य है जहाँ छत्तीसगढ़ का भूगोल और छत्तीसगढ़ की भौगोलिक विविधताएँ इसे अन्य राज्यों से अद्वितीय बनाती हैं।

यहाँ की उपजाऊ महानदी बेसिन से लेकर घने दण्डकारण्य के पठार और खनिज-समृद्ध पहाड़ी श्रृंखलाएँ, सब कुछ इस राज्य की समृद्धि और प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक हैं। CGPSC और Vyapam जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए, **छत्तीसगढ़ का भूगोल** एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है, जिससे हर साल कई प्रश्न पूछे जाते हैं।

यह लेख **छत्तीसगढ़ का भूगोल** पर एक संपूर्ण और विस्तृत गाइड है, जिसे विशेष रूप से उन अभ्यर्थियों के लिए तैयार किया गया है जो राज्य की प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करना चाहते हैं।

हम यहाँ छत्तीसगढ़ की भौगोलिक स्थिति, भूगर्भीय संरचना, भौतिक विभाजन, अपवाह तंत्र (नदियाँ), जलवायु, मिट्टी, वन संसाधन, वन्यजीव और खनिज संपदा के साथ परिवहन का गहराई से विश्लेषण करेंगे। यह सुनिश्चित करने के लिए कि आपको सबसे अद्यतन और सटीक जानकारी मिले, हमने इसे 2025 के नवीनतम आंकड़ों और तथ्यों के साथ अपडेट किया है।

इस गाइड का उद्देश्य न केवल आपको परीक्षा के लिए तैयार करना है, बल्कि **छत्तीसगढ़ का भूगोल** की गहरी समझ विकसित करने में भी मदद करना है, ताकि आप हर प्रश्न का आत्मविश्वास के साथ उत्तर दे सकें।


विषय-सूची (Table of Contents)


1. छत्तीसगढ़ का भूगोल एक संक्षिप्त परिचय और भौगोलिक स्थिति

छत्तीसगढ़ राज्य का गठन 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर हुआ था। यह भारत के मध्य-पूर्वी भाग में स्थित एक लैंडलॉक (भू-आवेष्ठित) राज्य है, जिसका कोई भी हिस्सा समुद्र से नहीं मिलता।

  • राजधानी: रायपुर (नया रायपुर/अटल नगर)
  • क्षेत्रफल: 1,35,192 वर्ग किलोमीटर (भारत का 9वां सबसे बड़ा राज्य)
  • आकार: समुद्री घोड़े या डॉल्फिन के समान।
  • अक्षांशीय विस्तार: 17°46′ उत्तरी अक्षांश से 24°05′ उत्तरी अक्षांश तक।
  • देशांतरीय विस्तार: 80°15′ पूर्वी देशांतर से 83°30′ पूर्वी देशांतर तक।
  • कर्क रेखा: राज्य के उत्तरी भाग (बलरामपुर, सूरजपुर, कोरिया जिलों) से होकर गुजरती है। इसका प्रभाव यहाँ की जलवायु पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

पड़ोसी राज्य:

छत्तीसगढ़ 7 राज्यों से घिरा हुआ है, जो इसकी क्षेत्रीय विविधता को दर्शाते हैं:

  1. उत्तर-पश्चिम: मध्य प्रदेश
  2. उत्तर: उत्तर प्रदेश
  3. उत्तर-पूर्व: झारखंड
  4. पूर्व: ओडिशा
  5. दक्षिण: आंध्र प्रदेश और तेलंगाना (कुछ स्रोतों के अनुसार तेलंगाना, आंध्र प्रदेश से अलग होने के बाद अब 7वां पड़ोसी राज्य है)
  6. दक्षिण-पश्चिम: महाराष्ट्र

यह भौगोलिक स्थिति राज्य को विभिन्न संस्कृतियों और भाषाओं के संगम बिंदु पर खड़ा करती है, जो इसकी अनूठी पहचान को आकार देती है।

2. छत्तीसगढ़ का भूगोल, भूगर्भीय संरचना और खनिज संपदा पर प्रभाव

छत्तीसगढ़ की भूगर्भीय संरचना अत्यंत प्राचीन और विविध है, जिसने राज्य की समृद्ध खनिज संपदा को आकार दिया है। यहाँ मुख्यतः निम्नलिखित शैल समूह पाए जाते हैं:

  1. आर्कियन शैल समूह: ये सबसे पुरानी चट्टानें हैं और राज्य के दक्षिणी भाग (बस्तर) तथा उत्तरी भाग में पाई जाती हैं। इनमें ग्रेनाइट और नीस शामिल हैं। ये लौह अयस्क, टिन और अभ्रक जैसे खनिजों के स्रोत हैं।
  2. धारवाड़ शैल समूह: आर्कियन के बाद निर्मित, ये चट्टानें लौह अयस्क की प्रमुख स्रोत हैं। दल्ली-राजहरा और बैलाडीला की प्रसिद्ध लौह अयस्क खदानें इसी समूह का हिस्सा हैं। ये बस्तर और कवर्धा-राजनांदगांव बेल्ट में पाई जाती हैं।
  3. कड़प्पा शैल समूह: चूना पत्थर, डोलोमाइट और बलुआ पत्थर के लिए प्रसिद्ध। ये मुख्य रूप से महानदी बेसिन (छत्तीसगढ़ का मैदान) और रायगढ़ बेसिन में पाए जाते हैं। सीमेंट उद्योग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण।
  4. गोंडवाना शैल समूह: ये कोयले के विशाल भंडारों के लिए जाने जाते हैं। कोरबा, रायगढ़ और चिरमिरी कोयला क्षेत्र इसी समूह का हिस्सा हैं। इन्हें ऊपरी और निचले गोंडवाना समूह में बांटा गया है।
  5. दक्कन ट्रैप: राज्य के उत्तर-पश्चिमी हिस्से (मैकल श्रेणी, कवर्धा) में पाए जाते हैं। ये बेसाल्टिक चट्टानें बॉक्साइट के भंडारों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  6. लैटेराइट: ये मिट्टियाँ पाट प्रदेशों में पाई जाती हैं और बॉक्साइट का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

इस भूगर्भीय विविधता के कारण ही छत्तीसगढ़ भारत के सबसे खनिज-समृद्ध राज्यों में से एक है, और इसे “खनिजों का गढ़” कहा जाता है।

3. छत्तीसगढ़ का भौतिक विभाजन: प्रमुख प्रदेश और उनकी विशेषताएँ

भौगोलिक विशेषताओं और स्थलाकृति के आधार पर **छत्तीसगढ़ का भूगोल** या छत्तीसगढ़ का भौतिक विभाजन चार प्रमुख भौतिक विभागों में बंटा हुआ है:

3.1. पूर्वी बघेलखण्ड का पठार

  • विस्तार: राज्य के उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी भाग में, मुख्य रूप से कोरिया, सूरजपुर, बलरामपुर और सरगुजा जिलों में। यह मध्य प्रदेश के बघेलखण्ड पठार का पूर्वी विस्तार है।
  • विशेषताएँ: यह पठारी क्षेत्र कैमूर पर्वत श्रृंखला और चांगभखार-देवगढ़ की पहाड़ियों से युक्त है। यहाँ की प्रमुख चोटियों में देवगढ़ (1033 मीटर) शामिल है।
  • नदियाँ: हसदेव, रिहन्द और बनास जैसी महत्वपूर्ण नदियाँ यहीं से निकलती हैं। हसदेव नदी पर मिनीमाता बांगो बांध स्थित है।
  • खनिज: कोयले के विशाल भंडार (जैसे चिरमिरी, बैकुंठपुर, हसदेव-अरण्य) यहाँ पाए जाते हैं।

3.2. जशपुर-सामरी पाट प्रदेश

  • विस्तार: राज्य के उत्तर-पूर्वी भाग में, जशपुर, सामरी, मैनपाट और पेंड्रापाट क्षेत्रों में फैला हुआ है।
  • विशेषताएँ: यह क्षेत्र ऊँची, सपाट शीर्ष वाली पहाड़ियों (जिन्हें ‘पाट’ कहा जाता है) के लिए प्रसिद्ध है। यह छत्तीसगढ़ का सबसे ऊँचा भू-भाग है।
    • सर्वोच्च चोटी: गौरलाटा (सामरीपाट, बलरामपुर) – 1225 मीटर।
    • अन्य पाट: मैनपाट (जिसे ‘छत्तीसगढ़ का शिमला’ कहा जाता है), जशपुरपाट, पेंड्रापाट।
  • खनिज: बॉक्साइट के प्रमुख भंडार यहीं केंद्रित हैं, जो एल्यूमीनियम उद्योग के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • जलवायु: ऊँचाई के कारण यहाँ की जलवायु अपेक्षाकृत ठंडी और आर्द्र होती है, विशेषकर मैनपाट में।

3.3. छत्तीसगढ़ का मैदान (महानदी बेसिन)

  • विस्तार: यह राज्य के मध्य भाग में स्थित सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण भौतिक प्रदेश है, जो लगभग 68,064 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला है। इसे ‘छत्तीसगढ़ का हृदय स्थल’ भी कहा जाता है।
  • विशेषताएँ: महानदी और उसकी सहायक नदियों (शिवनाथ, हसदेव, पैरी, जोंक, सोंढूर, मांड) द्वारा निर्मित यह एक विस्तृत और अत्यंत उपजाऊ मैदान है।
    • धान का कटोरा: इसकी अत्यधिक उर्वरता और धान उत्पादन के कारण इसे यह उपनाम मिला है।
    • भूगर्भीय संरचना: यहाँ मुख्य रूप से कड़प्पा शैल समूह और जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है।
  • प्रमुख शहर: रायपुर, दुर्ग, भिलाई, बिलासपुर, राजनांदगांव जैसे बड़े शहर इसी मैदान में स्थित हैं।
  • कृषि: धान के अलावा गन्ना, दालें और अन्य फसलें भी यहाँ उगाई जाती हैं।

3.4. दण्डकारण्य का पठार (बस्तर का पठार)

  • विस्तार: राज्य के दक्षिणी भाग में, बस्तर संभाग के जिलों (दंतेवाड़ा, बस्तर, कोंडागांव, सुकमा, नारायणपुर, बीजापुर) में फैला हुआ है।
  • विशेषताएँ: यह क्षेत्र घने वनों, पहाड़ी श्रृंखलाओं, प्राचीन आर्कियन और धारवाड़ चट्टानों से युक्त है। यह खनिज संपदा, विशेष रूप से लौह अयस्क और टिन के लिए जाना जाता है।
    • नदियाँ: इंद्रावती नदी यहाँ की मुख्य जीवन रेखा है।
    • जलप्रपात: प्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात (जिसे ‘भारत का नियाग्रा’ कहते हैं) इंद्रावती नदी पर स्थित है। तीरथगढ़ जलप्रपात भी यहीं है।
    • वन्यजीव: कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान और इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान जैसे महत्वपूर्ण वन्यजीव क्षेत्र यहीं स्थित हैं।
    • जनजातीय क्षेत्र: यह क्षेत्र राज्य की जनजातीय संस्कृति का केंद्र है।

प्रमुख चोटियाँ और उनकी ऊँचाई:

  • गौरलाटा (सामरीपाट): 1225 मीटर (छत्तीसगढ़ की सबसे ऊँची चोटी)
  • नंदीराज (बैलाडीला): 1210 मीटर
  • मैनपाट (सरगुजा): 1152 मीटर
  • बदलगढ़ (जशपुर): 1176 मीटर
  • पालमा (पेंड्रापाट): 1080 मीटर

4. छत्तीसगढ़ का अपवाह तंत्र (नदी प्रणाली): जीवन रेखाएँ

**छत्तीसगढ़ का भूगोल** उसकी समृद्ध नदी प्रणाली के बिना अधूरा है। राज्य की नदियाँ न केवल <a href=”https://msworldhindi.com/chhattisgarh-me-krishi-agriculture-in-cg-hindi/”>सिंचाई </a> और पेयजल का स्रोत हैं, बल्कि इसकी संस्कृति और अर्थव्यवस्था का भी अभिन्न अंग हैं। छत्तीसगढ़ के अपवाह तंत्र को मुख्य रूप से चार भागों में बांटा गया है:

अपवाह तंत्रक्षेत्रफल (%)प्रमुख नदीमुख्य सहायक नदियाँविसर्जनसंबंधित जिले
महानदी अपवाह तंत्र56.15%महानदीशिवनाथ, हसदेव, मांड, ईब, पैरी, सोंढूर, जोंक, बोरई, सूका, लातबंगाल की खाड़ीधमतरी, रायपुर, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, रायगढ़ आदि।
गोदावरी अपवाह तंत्र28.64%इंद्रावती (गोदावरी की सहायक)कोटरी, डंकिनी-शंखिनी, नारंगी, सबरी (कोलाब), चिंताबंगाल की खाड़ी (गोदावरी के माध्यम से)बस्तर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, कोंडागांव, सुकमा।
सोन-गंगा अपवाह तंत्र13.63%सोन नदी (मुख्यतः सहायक नदियाँ राज्य में)बनास, गोपद, रिहन्द, कन्हार, नेऊरगंगा नदी (सोन के माध्यम से)कोरिया, बलरामपुर, सरगुजा, सूरजपुर।
नर्मदा अपवाह तंत्र0.55%नर्मदा (मुख्यतः सहायक नदियाँ राज्य में)बंजर, ताड़ाअरब सागर (नर्मदा के माध्यम से)कवर्धा (मैकल श्रेणी का पश्चिमी ढलान)।

4.1. महानदी अपवाह तंत्र

यह छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा अपवाह तंत्र है।

  • महानदी:
    • उद्गम: सिहावा पर्वत (फर्सिया गाँव), धमतरी जिला।
    • विशेषता: इसे ‘छत्तीसगढ़ की जीवन रेखा’ कहा जाता है। इसकी कुल लंबाई 858 किमी है, जिसमें से लगभग 286 किमी छत्तीसगढ़ में बहती है।
    • सहायक नदियाँ: शिवनाथ (सबसे बड़ी सहायक), हसदेव, मांड, ईब, पैरी, सोंढूर, जोंक, बोरई, सूका, लात।
    • बांध/परियोजना: रुद्री बैराज, गंगरेल बांध (धमतरी), हीराकुंड बांध (ओडिशा)।
  • शिवनाथ नदी:
    • उद्गम: पानाबरस पहाड़ी (अब मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिला)।
    • विशेषता: महानदी की सबसे लंबी सहायक नदी और छत्तीसगढ़ में बहने वाली सबसे लंबी नदी (290 किमी)। यह महानदी को शिवरी नारायण (जांजगीर-चांपा) में मिलती है।
  • हसदेव नदी:
    • उद्गम: कैमूर की पहाड़ियाँ (सोनहत पठार, कोरिया जिला)।
    • विशेषता: कोरबा में मिनीमाता बांगो बांध (हसदेव बांगो परियोजना) इस पर बना है।
  • पैरी और सोंढूर: ये महानदी की प्रमुख सहायक नदियाँ हैं जो गरियाबंद जिले से निकलती हैं। पैरी नदी पर सोंढूर बांध स्थित है।

4.2. गोदावरी अपवाह तंत्र

यह दक्षिणी छत्तीसगढ़ (बस्तर संभाग) का मुख्य अपवाह तंत्र है।

  • इंद्रावती नदी:
    • उद्गम: मुंगेर पहाड़ी (कालाहांडी जिला, ओडिशा)।
    • विशेषता: ‘बस्तर की जीवन रेखा’ कहलाती है। छत्तीसगढ़ में 264 किमी बहती है और भद्रकाली (बीजापुर) के पास गोदावरी में मिल जाती है।
    • जलप्रपात: प्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात (जगदलपुर) इसी नदी पर है।
  • डंकिनी-शंखिनी नदी: दंतेवाड़ा में बहने वाली यह नदियाँ लौह अयस्क के कारण लाल रंग की दिखती हैं। दंतेश्वरी मंदिर इन्हीं के संगम पर स्थित है।
  • कोटरी नदी (परलकोट): यह इंद्रावती की सबसे बड़ी सहायक नदी है, जिसका उद्गम मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी से होता है।
  • सबरी नदी (कोलाब): बस्तर पठार से निकलकर आंध्र प्रदेश की ओर बहती है।

4.3. सोन-गंगा अपवाह तंत्र

यह उत्तरी छत्तीसगढ़ का अपवाह तंत्र है, जहाँ से नदियाँ सोन नदी के माध्यम से गंगा में मिलती हैं।

  • रिहन्द नदी:
    • उद्गम: मतिरिंगा पहाड़ (अंबिकापुर, सरगुजा)।
    • विशेषता: इसे ‘रेणुका’ नदी भी कहते हैं। इस पर गोविंद वल्लभ पंत सागर बांध (उत्तर प्रदेश) बना है।
  • कन्हार नदी:
    • उद्गम: बखोना चोटी (जशपुर)।
    • विशेषता: यह झारखंड और उत्तर प्रदेश से होते हुए सोन में मिलती है।

4.4. नर्मदा अपवाह तंत्र

यह छत्तीसगढ़ का सबसे छोटा अपवाह तंत्र है, जो मैकल श्रेणी के पश्चिमी ढलान पर केंद्रित है।

  • विशेषता: नर्मदा नदी खुद छत्तीसगढ़ से नहीं बहती, बल्कि इसकी सहायक नदियाँ (जैसे बंजर, ताड़ा) राज्य के पश्चिमी सीमांत क्षेत्रों से निकलती हैं और नर्मदा में मिलती हैं।
  • क्षेत्र: मुख्य रूप से कवर्धा जिले के कुछ पश्चिमी भाग।

5. छत्तीसगढ़ की जलवायु, मिट्टी और वन संसाधन

**छत्तीसगढ़ का भूगोल** न केवल इसकी भू-आकृति में, बल्कि इसकी जलवायु, मिट्टी और वनस्पति में भी अपनी विविधता दर्शाता है। ये कारक मिलकर राज्य की कृषि, अर्थव्यवस्था और जैव विविधता को निर्धारित करते हैं।

5.1. जलवायु: उष्णकटिबंधीय मानसूनी स्वरूप

छत्तीसगढ़ की जलवायु मुख्यतः **उष्णकटिबंधीय मानसूनी** प्रकार की है। यहाँ तीन प्रमुख ऋतुएँ स्पष्ट रूप से अनुभव की जाती हैं:

  1. ग्रीष्म ऋतु (मार्च-जून):
    • यह गर्म और शुष्क होती है। मई सबसे गर्म महीना होता है।
    • सबसे गर्म स्थान: चांपा, बिलासपुर।
    • तापमान: 40°C से 45°C तक पहुँच जाता है।
  2. वर्षा ऋतु (जून-अक्टूबर):
    • राज्य में अधिकांश वर्षा (लगभग 90%) दक्षिण-पश्चिम मानसून से होती है।
    • औसत वर्षा: लगभग 1200-1400 मिमी।
    • सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र: अबूझमाड़ (नारायणपुर), जिसे ‘छत्तीसगढ़ का चेरापूंजी’ भी कहा जाता है, जहाँ 1500 मिमी से अधिक वर्षा होती है।
    • सबसे कम वर्षा वाला क्षेत्र: कवर्धा (मैकल श्रेणी के वृष्टिछाया क्षेत्र में)।
  3. शीत ऋतु (नवंबर-फरवरी):
    • यह हल्की ठंडी और शुष्क होती है। दिसंबर-जनवरी सबसे ठंडे महीने होते हैं।
    • सबसे ठंडा स्थान: मैनपाट (सरगुजा), पेंड्रा रोड (गौरेला-पेंड्रा-मरवाही)।
    • उत्तरी छत्तीसगढ़ में तापमान 5°C तक गिर सकता है।

कर्क रेखा का प्रभाव: राज्य के उत्तरी भाग से कर्क रेखा गुजरने के कारण, यह क्षेत्र उष्णकटिबंधीय जलवायु के अधिक प्रभाव में रहता है, जबकि दक्षिणी भाग थोड़ा अधिक भूमध्यरेखीय विशेषताओं को दर्शाता है।

5.2. मिट्टी: प्रकार और कृषि पर प्रभाव

छत्तीसगढ़ में कृषि, विशेषकर धान की खेती, यहाँ की मिट्टियों पर अत्यधिक निर्भर करती है। राज्य में मुख्य रूप से पांच प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं:

  1. लाल-पीली मिट्टी (स्थानीय नाम: मटासी):
    • विस्तार: राज्य के लगभग 50-60% भाग में पाई जाती है, खासकर महानदी बेसिन में।
    • विशेषता: लौह ऑक्साइड की उपस्थिति के कारण लाल और जल योजन के कारण पीली दिखती है। धान की खेती के लिए सबसे उपयुक्त। नाइट्रोजन, फास्फोरस और ह्यूमस की कमी होती है।
  2. लाल-रेतीली मिट्टी (स्थानीय नाम: टिकरा):
    • विस्तार: मुख्य रूप से बस्तर संभाग और पहाड़ी ढलानों पर।
    • विशेषता: कम उपजाऊ होती है, पानी धारण करने की क्षमता कम होती है। मोटे अनाज जैसे कोदो, कुटकी के लिए उपयुक्त।
  3. काली मिट्टी (स्थानीय नाम: कन्हार, भर्री):
    • विस्तार: मैकल श्रेणी के पश्चिमी भाग, दुर्ग, राजनांदगांव, कवर्धा।
    • विशेषता: बेसाल्ट चट्टानों के टूटने से बनती है। अत्यधिक जल धारण क्षमता वाली, सूखने पर दरारें पड़ जाती हैं। कपास, गन्ना, चना के लिए उत्तम।
  4. लैटेराइट मिट्टी (स्थानीय नाम: भाठा):
    • विस्तार: पाट प्रदेशों (सरगुजा, जशपुर), जलोढ़ मैदान के उच्च भूमि क्षेत्रों में।
    • विशेषता: लीचिंग (निक्षालन) प्रक्रिया से बनती है। कठोर और कम उपजाऊ। बागवानी फसलें, ईंट निर्माण के लिए उपयुक्त। बॉक्साइट इसी मिट्टी में मिलता है।
  5. लाल-दोमट मिट्टी:
    • विस्तार: दंतेवाड़ा और सुकमा के कुछ भागों में।
    • विशेषता: यह भी कम उपजाऊ होती है।

5.3. वन एवं वन्यजीव: जैव विविधता का खजाना

छत्तीसगढ़ भारत के सबसे अधिक वनाच्छादित राज्यों में से एक है, जो इसकी पर्यावरणीय स्थिरता और जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण है।

राज्य का कुल **वन क्षेत्र लगभग 59,772 वर्ग किलोमीटर** है, जो इसके कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग **44.21%** है (वन स्थिति रिपोर्ट 2021 के अनुसार)। आरक्षित वन, संरक्षित वन और अवर्गीकृत वन यहाँ पाए जाते हैं।

वनों के प्रकार:

  1. उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन: राज्य का अधिकांश वन क्षेत्र इसी प्रकार का है। गर्मी में ये वृक्ष अपनी पत्तियां गिरा देते हैं।
    • प्रमुख वृक्ष: साल (सरई) – राज्य का राजकीय वृक्ष, सागौन (सगोन), बीजा, शीशम, हल्दू, तेंदूपत्ता, बांस, महुआ।
  2. उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन: कुछ अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों (जैसे बस्तर का दक्षिणी भाग) में पाए जाते हैं।

वन्यजीव संरक्षण:

छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध वन्यजीवों के लिए भी जाना जाता है, जिनमें जंगली भैंसा (राज्य पशु), पहाड़ी मैना (राज्य पक्षी), बाघ, तेंदुआ, भालू और विभिन्न प्रकार के हिरण शामिल हैं।

  • राष्ट्रीय उद्यान (National Parks): राज्य में 3 राष्ट्रीय उद्यान हैं:
    • इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान (बीजापुर): बाघ संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण।
    • गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान (कोरिया/सूरजपुर): एशिया का सबसे बड़ा बायोस्फीयर रिजर्व बनाने का प्रस्ताव।
    • कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान (बस्तर): पहाड़ी मैना और चूना पत्थर की लाजवाब गुफाओं के लिए प्रसिद्ध।
  • वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuaries): राज्य में कुल 11 वन्यजीव अभयारण्य हैं।

    • सीतानदी अभयारण्य (धमतरी): सबसे पुराना अभयारण्य।

    • अचानकमार अभयारण्य (मुंगेली): टाइगर रिजर्व भी है।

    • बारनवापारा अभयारण्य (महासमुंद):

    • भैरमगढ़ और पामेड़ अभयारण्य (बीजापुर):

    • उदंती अभयारण्य (गरियाबंद): जंगली भैंसों केके लिए जाना जाता है।



    छत्तीसगढ़ के वन आंकड़े (वन स्थिति रिपोर्ट 2021 के अनुसार):



    • कुल वन क्षेत्र: 59,772 वर्ग किमी

    • कुल भौगोलिक क्षेत्र का प्रतिशत: 44.21%

    • वनवरण (Forest Cover): 55,717 वर्ग किमी

    • वृक्षारण (Tree Cover): 4,244 वर्ग किमी

    • सर्वाधिक वन क्षेत्र वाला जिला: बीजापुर

    • न्यूनतम वन क्षेत्र वाला जिला: दुर्ग



    6. छत्तीसगढ़: खनिजों का गढ़ और औद्योगिक विकास


    **छत्तीसगढ़ का भूगोल** इसे भारत के सबसे खनिज-समृद्ध राज्यों में से एक बनाता है, जिसके कारण इसे “खनिजों का गढ़” और “भारत का रूर” कहा जाता है।

  • राज्य में विभिन्न प्रकार के धात्विक और अधात्विक खनिज पाए जाते हैं, जो इसकी अर्थव्यवस्था और औद्योगिक विकास की रीढ़ हैं।
  • हमने छत्तीसगढ़ के ऊर्जा संसाधन विषय पर एक विस्तृत पोस्ट भी बनाया है जिन्हें आप देख सकते हैं।
  • कोयला और लौह अयस्क: ऊर्जा और इस्पात की नींव

    कोयला (Coal):


    छत्तीसगढ़ भारत के प्रमुख कोयला उत्पादक राज्यों में से एक है, और देश के कुल कोयला भंडार का लगभग **18%** यहाँ पाया जाता है। यह मुख्य रूप से गोंडवाना शैल समूह की चट्टानों में मिलता है।



    • प्रमुख कोयला क्षेत्र:

      • कोरबा कोयला क्षेत्र: यह एशिया का सबसे बड़ा ओपन कास्ट कोयला खदान है और छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक क्षेत्र।

      • रायगढ़ कोयला क्षेत्र: माण्ड नदी घाटी में स्थित एक महत्वपूर्ण क्षेत्र।

      • हसदेव-अरण्य कोयला क्षेत्र: ऊर्जा उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण।

      • अन्य क्षेत्र: चिरमिरी (कोरिया), सोनहत, झिलमिली, लखनपुर (सरगुजा), तातापानी-रामकोला (बलरामपुर)।



    • उपयोग: मुख्य रूप से ताप विद्युत उत्पादन और विभिन्न उद्योगों में ईंधन के रूप में।


    लौह अयस्क (Iron Ore):


    छत्तीसगढ़ उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क (हेमेटाइट) के विशाल भंडारों के लिए प्रसिद्ध है, जो धारवाड़ शैल समूह में पाए जाते हैं।



    • प्रमुख लौह अयस्क क्षेत्र:

      • बैलाडीला (दंतेवाड़ा): एशिया की सबसे बड़ी मैकेनाइज्ड लौह अयस्क खदान। यहाँ से लौह अयस्क का निर्यात जापान और दक्षिण कोरिया को किया जाता है (विशाखापत्तनम बंदरगाह के माध्यम से)। यहाँ नंदीराज नामक एक प्रमुख चोटी भी है।

      • दल्ली राजहरा (बालोद): भिलाई स्टील प्लांट (BSP) को लौह अयस्क की आपूर्ति यहीं से होती है।

      • रावघाट (कांकेर): BSP के लिए भविष्य का प्रमुख स्रोत।

      • अन्य क्षेत्र: छोटे डोंगर (कांकेर), मेटाबोदेली, मोहला।



    • उपयोग: इस्पात उद्योग का आधार।


    6.2. अन्य महत्वपूर्ण खनिज: बॉक्साइट, चूना पत्थर, टिन और हीरा


    बॉक्साइट (Bauxite):


    एल्यूमीनियम का प्रमुख अयस्क। यह मुख्य रूप से पाट प्रदेशों और दक्कन ट्रैप क्षेत्रों में पाया जाता है।



    • प्रमुख क्षेत्र: मैनपाट (सरगुजा), जशपुर पाट, सामरी पाट (बलरामपुर), पेंड्रापाट (गौरेला-पेंड्रा-मरवाही), केशकाल घाटी (कोंडागांव)।


    चूना पत्थर (Limestone):


    सीमेंट उद्योग का आधार। यह कड़प्पा शैल समूह में प्रचुर मात्रा में मिलता है।



    • प्रमुख क्षेत्र: रायपुर, बलौदाबाजार-भाटापारा, जांजगीर-चांपा, दुर्ग, बिलासपुर। बलौदाबाजार को ‘सीमेंट हब’ कहा जाता है।


    टिन अयस्क (Tin Ore):


    भारत का **एकमात्र टिन उत्पादक राज्य** छत्तीसगढ़ है। यह मुख्य रूप से बस्तर क्षेत्र की आर्कियन ग्रेनाइट चट्टानों में कैसिटेराइट के रूप में पाया जाता है।



    • प्रमुख क्षेत्र: दंतेवाड़ा (कटेकल्याण), सुकमा, बस्तर।


    हीरा (Diamond):


    किम्बरलाइट पाइप में पाया जाता है।



    • प्रमुख क्षेत्र: देवभोग, मैनपुर (गरियाबंद), बस्तर के कुछ भाग।


    अन्य खनिज:



    • क्वार्ट्जाइट: सीमेंट और कांच उद्योग में।

    • डोलोमाइट: भिलाई स्टील प्लांट में उपयोग।

    • सोना: सोनाखान (बलौदाबाजार), तपकरा (जशपुर) – सीमित मात्रा में।


    7. मानव और आर्थिक भूगोल: छत्तीसगढ़ का भूगोल का मानवीय प्रभाव


    छत्तीसगढ़ का भूगोल सिर्फ इसकी प्राकृतिक संरचना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यहाँ के जनसंख्या वितरण, कृषि पैटर्न और औद्योगिक विकास को भी सीधे तौर पर प्रभावित करता है।


    7.1. जनसंख्या वितरण पर प्रभाव


    राज्य की जनसंख्या का घनत्व भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार भिन्न है। छत्तीसगढ़ के मैदान (महानदी बेसिन) में उपजाऊ मिट्टी, समतल भूमि और पानी की उपलब्धता के कारण जनसंख्या घनत्व सबसे अधिक है। रायपुर, दुर्ग, और बिलासपुर जैसे प्रमुख शहर इसी क्षेत्र में स्थित हैं। इसके विपरीत, दण्डकारण्य का पठार (बस्तर) और पूर्वी बघेलखण्ड का पठार जैसे जंगली और पहाड़ी क्षेत्रों में कठिन भू-भाग और कम कृषि अवसरों के कारण जनसंख्या विरल है।


    7.2. कृषि क्षेत्र (Agro-Climatic Zones)


    भौगोलिक विविधता के आधार पर, छत्तीसगढ़ का भूगोल मुख्य रूप से तीन कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बांटा गया है:



    • उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र: सरगुजा, कोरिया, जशपुर आदि। यहाँ मोटे अनाज और बागवानी फसलें प्रमुख हैं।

    • छत्तीसगढ़ का मैदानी क्षेत्र: रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग संभाग। यह धान का कटोरा है और राज्य का मुख्य कृषि केंद्र है।

    • बस्तर का पठारी क्षेत्र: बस्तर संभाग। यहाँ मोटे अनाज, वनोपज और कुछ हद तक धान की खेती होती है।


    7.3. उद्योगों का वितरण और छत्तीसगढ़ का भूगोल से संबंध


    छत्तीसगढ़ के उद्योगों की स्थापना सीधे तौर पर खनिज संसाधनों की उपलब्धता से जुड़ी है:



    • इस्पात उद्योग (Iron & Steel): भिलाई स्टील प्लांट (BSP) की स्थापना दल्ली-राजहरा और बैलाडीला की लौह अयस्क खदानों के पास की गई।

    • ऊर्जा उद्योग (Power): कोरबा को ‘ऊर्जा राजधानी’ कहा जाता है क्योंकि यहाँ कोयले के विशाल भंडार हैं, जिस पर आधारित कई ताप विद्युत गृह (Power Plants) स्थापित हैं।

    • सीमेंट उद्योग (Cement): रायपुर और बलौदाबाजार क्षेत्र में कड़प्पा शैल समूह से मिलने वाले चूना पत्थर के कारण, यह क्षेत्र देश का सबसे बड़ा सीमेंट हब बन गया है।

    • एल्यूमीनियम उद्योग (Aluminium): बाल्को (BALCO) की स्थापना पाट प्रदेशों से मिलने वाले बॉक्साइट पर आधारित है।


    8. छत्तीसगढ़ का भूगोल विषय से जुड़े कुछ रोचक तथ्य और महत्वपूर्ण बिंदु



    • छत्तीसगढ़ का शिमला: मैनपाट (सरगुजा)।

    • छत्तीसगढ़ का चेरापूंजी: अबूझमाड़ (नारायणपुर), सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान।

    • छत्तीसगढ़ की जीवन रेखा: महानदी।

    • बस्तर की जीवन रेखा: इंद्रावती नदी।

    • भारत का नियाग्रा: चित्रकोट जलप्रपात (इंद्रावती नदी पर, जगदलपुर)।

    • सर्वाधिक वन प्रतिशत वाला जिला: नारायणपुर।

    • सबसे ऊँची चोटी: गौरलाटा (1225 मीटर, सामरीपाट, बलरामपुर)।

    • सबसे बड़ा भौतिक प्रदेश: छत्तीसगढ़ का मैदान (महानदी बेसिन)।

    • राज्य की औसत वार्षिक वर्षा: 1200-1400 मिमी।

    • मुख्य फसल: धान (चावल), जिसके कारण ‘धान का कटोरा’ कहलाता है।

    • सर्वाधिक गर्म स्थान: चांपा।

    • सर्वाधिक ठंडा स्थान: मैनपाट।

    • बॉक्साइट के लिए प्रसिद्ध: पाट प्रदेश।

    • टिन का एकमात्र उत्पादक: छत्तीसगढ़।

    • मैकल श्रेणी: यह विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं का हिस्सा है, जो छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित है। यह वृष्टिछाया क्षेत्र बनाती है जहाँ वर्षा कम होती है (जैसे कवर्धा)।


    9. आपके अध्ययन को बेहतर बनाने के लिए इंटरनल लिंक्स


    छत्तीसगढ़ का भूगोल की गहरी समझ के बाद छत्तीसगढ़ का इतिहास से सम्लिबन्धित संपूर्ण जानकारी के लिए, हमारे अन्य विस्तृत पोस्ट्स से जुड़ें:



    10. निष्कर्ष


    **छत्तीसगढ़ का भूगोल** एक ऐसा विषय है जो न केवल प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि राज्य की समग्र पहचान को समझने के लिए भी आवश्यक है। यहाँ की नदियाँ, पर्वत, घने जंगल और प्रचुर खनिज संपदा इसे प्रकृति और संसाधनों का एक अनूठा संगम बनाते हैं। इस विस्तृत गाइड में, हमने छत्तीसगढ़ की भौगोलिक स्थिति से लेकर उसके भौतिक विभाजन, अपवाह तंत्र, जलवायु, मिट्टी, वन और खनिज संसाधनों तक, हर पहलू को गहराई से कवर किया है।


    हमें उम्मीद है कि यह पोस्ट आपको **छत्तीसगढ़ का भूगोल (CGPSC/Vyapam हेतु संपूर्ण Guide)** की एक व्यापक और स्पष्ट समझ प्रदान करेगी, और आपकी परीक्षा की तैयारी में अत्यंत सहायक सिद्ध होगी। इस ज्ञान के साथ, आप छत्तीसगढ़ की इस समृद्ध भूमि के बारे में अधिक आत्मविश्वास महसूस करेंगे।



    💬 आपके विचार: छत्तीसगढ़ का भूगोल विषय के अंतर्गत छत्तीसगढ़ की कौन सी भौगोलिक विशेषता आपको सबसे ज्यादा प्रभावित करती है और क्यों? अपनी राय और प्रश्न नीचे कमेंट्स में साझा करें!



    11. संदर्भ और स्रोत (References and Sources)



    यह लेख सिर्फ जानकारी का संग्रह नहीं, बल्कि एक गहन शोध का परिणाम है। इसमें प्रस्तुत सभी आंकड़ों और तथ्यों की सटीकता सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित आधिकारिक सरकारी वेबसाइटों, रिपोर्टों और प्रकाशनों का संदर्भ लिया गया है।


    सरकारी वेबसाइट एवं पोर्टल (Government Websites & Portals)




    • छत्तीसगढ़ शासन का आधिकारिक पोर्टल:

      (राज्य की सामान्य भौगोलिक और प्रशासनिक जानकारी के लिए)

      [आधिकारिक वेबसाइट]


    • भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI):

      (राज्य के वन आवरण, वनों के प्रकार और संबंधित आंकड़ों के लिए, विशेष रूप से ‘State of Forest Report’)

      [आधिकारिक वेबसाइट]


    • भारत का भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI):

      (छत्तीसगढ़ की भूगर्भीय संरचना, शैल समूहों और खनिज वितरण के वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए)

      [आधिकारिक वेबसाइट]


    • भुवन – इसरो का जियो-पोर्टल (Bhuvan – ISRO’s Geo-Portal):

      (राज्य के उपग्रह चित्रों, स्थलाकृति और भौगोलिक मानचित्रण के लिए)

      [जियो-पोर्टल देखें]


    पुस्तकें एवं प्रकाशन (Books & Publications)




    • छत्तीसगढ़ वृहत संदर्भ (छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी):

      (छत्तीसगढ़ के भूगोल और इतिहास पर सबसे प्रामाणिक और विस्तृत प्रकाशनों में से एक) – यह एक भौतिक प्रकाशन है।


    • भारतीय खनिज ईयरबुक (Indian Minerals Yearbook – IBM):

      (खनिज उत्पादन और भंडार के आधिकारिक आंकड़ों के लिए)




    12. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)


    प्रश्न: ‘पाट प्रदेश’ क्या होता है?


    उत्तर: पाट प्रदेश एक ऊँची, समतल भूमि होती है जिसका ऊपरी सिरा टेबल की तरह सपाट होता है। छत्तीसगढ़ का जशपुर-सामरी पाट प्रदेश दक्कन के पठार का हिस्सा है और यह राज्य का सबसे ऊँचा भू-भाग है।


    प्रश्न: छत्तीसगढ़ की जीवन रेखा किस नदी को कहा जाता है?


    उत्तर: महानदी को ‘छत्तीसगढ़ की जीवन रेखा’ कहा जाता है क्योंकि यह राज्य के सबसे बड़े हिस्से में सिंचाई और पीने के पानी का मुख्य स्रोत है। इसी तरह, इंद्रावती नदी को ‘बस्तर की जीवन रेखा’ कहा जाता है।


    प्रश्न: छत्तीसगढ़ भारत का एकमात्र टिन उत्पादक राज्य है, यह कथन सही है या गलत?


    उत्तर: यह कथन पूरी तरह से सही है। भारत में टिन अयस्क (कैसिटेराइट) का व्यावसायिक उत्पादन केवल छत्तीसगढ़ में ही होता है, मुख्य रूप से दंतेवाड़ा और सुकमा जिलों में।


    प्रश्न: छत्तीसगढ़ में कुल कितने राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य हैं?


    उत्तर: वर्तमान में (अगस्त 2025 तक), छत्तीसगढ़ में 3 राष्ट्रीय उद्यान और 11 वन्यजीव अभयारण्य हैं।


    प्रश्न: छत्तीसगढ़ का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान कौन सा है?


    उत्तर: अबूझमाड़ (नारायणपुर) छत्तीसगढ़ का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान है, जिसे ‘छत्तीसगढ़ का चेरापूंजी’ भी कहा जाता है।


    प्रश्न: छत्तीसगढ़ को ‘धान का कटोरा’ क्यों कहा जाता है?


    उत्तर: छत्तीसगढ़ को ‘धान का कटोरा’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहाँ की महानदी बेसिन की उपजाऊ लाल-पीली मिट्टी और पर्याप्त वर्षा के कारण धान (चावल) का अत्यधिक उत्पादन होता है।




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