छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश: 36 गढ़ों का संपूर्ण इतिहास (CGPSC Guide)
जब हम ‘छत्तीसगढ़’ शब्द सुनते हैं, तो हमारे मन में ’36 गढ़ों’ (छत्तीस किलों) की एक छवि उभरती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह नाम और यह अनूठी प्रशासनिक व्यवस्था हमें किसने दी? या कैसे एक कलचुरि शासक मुगल सम्राट अकबर का समकालीन था और 8 वर्षों तक दिल्ली में रहा था?
इसका श्रेय उस राजवंश को जाता है जिसने इस क्षेत्र पर लगभग सात शताब्दियों (750 वर्ष) तक शासन किया – छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश।
यह लेख सिर्फ एक राजवंश का इतिहास नहीं है; यह उस प्रक्रिया की कहानी है जिसने ‘दक्षिण कोसल’ को ‘छत्तीसगढ़’ की स्थायी पहचान दी। CGPSC की प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के लिए छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश का इतिहास एक अनिवार्य विषय है।
यह लेख हमारे मुख्य गाइड “छत्तीसगढ़ का संपूर्ण इतिहास” का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। आइए, अब विशेष रूप से कलचुरियों के गौरवशाली इतिहास, उनकी प्रशासनिक व्यवस्था और उनकी सांस्कृतिक विरासत की गहराई में उतरें।
विषय सूची [x]
- छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश सत्ता की स्थापना
- रतनपुर के कलचुरि वंश की संपूर्ण वंशावली (विस्तृत विश्लेषण)
- रतनपुर कलचुरि वंश के सभी शासक (एक नज़र में)
- रतनपुर के कलचुरि वंश की संपूर्ण वंशावली (विस्तृत विश्लेषण)
- 1. कलिंगराज (1000 – 1020 ई.)
- 2. कमलराज (1020 – 1045 ई.)
- 3. रत्नदेव प्रथम / रत्नराज (1045 – 1065 ई.)
- 4. पृथ्वीदेव प्रथम (1065 – 1095 ई.)
- 5. जाजल्लदेव प्रथम (1095 – 1120 ई.)
- 6. रत्नदेव द्वितीय (1120 – 1135 ई.)
- 7. पृथ्वीदेव द्वितीय (1135 – 1165 ई.)
- 8. जाजल्लदेव द्वितीय (1165 – 1168 ई.)
- 9. जगतदेव (1168 – 1178 ई.)
- 10. रत्नदेव तृतीय (1178 – 1198 ई.)
- 11. प्रतापमल्ल (1198 – 1222 ई.)
- 12. बाहरेंद्र साय (1480 – 1525 ई.)
- 13. कल्याण साय (1544 – 1581 ई.)
- 14. रघुनाथ सिंह (1732 – 1745 ई.)
- 36 गढ़ व्यवस्था: छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक नींव
- 36 गढ़ों की सूची
- कला, धर्म और स्थापत्य: कलचुरि विरासत
- कलचुरि सत्ता का पतन और मराठों का आगमन
- त्वरित रिवीजन: परीक्षा के लिए मुख्य तथ्य
- संदर्भ और स्रोत (References and Sources)
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
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छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश सत्ता की स्थापना
छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश मूल रूप से त्रिपुरी (जबलपुर के पास) के शक्तिशाली कलचुरि साम्राज्य की एक शाखा था। लगभग 1000 ई. में, त्रिपुरी के शासक कोकल्लदेव द्वितीय के पुत्र **कलिंगराज** ने दक्षिण कोसल पर आक्रमण किया और तुम्माण को अपनी राजधानी बनाकर यहाँ छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश के सत्ता की नींव रखी।
उन्होंने सिरपुर के पांडु वंश के पतन के बाद उत्पन्न हुई राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाया।
रतनपुर के कलचुरि वंश की संपूर्ण वंशावली (विस्तृत विश्लेषण)
रतनपुर कलचुरि वंश के सभी शासक (एक नज़र में)
| क्रम | शासक का नाम | अनुमानित शासन काल (ईस्वी) | महत्वपूर्ण योगदान / मुख्य बातें |
|---|---|---|---|
| 1 | कलिंगराज | 1000 – 1020 | संस्थापक; राजधानी – तुम्माण। |
| 2 | कमलराज | 1020 – 1045 | त्रिपुरी के शासक गांगेयदेव की मदद की। |
| 3 | रत्नदेव प्रथम | 1045 – 1065 | रतनपुर को राजधानी बनाया; महामाया मंदिर का निर्माण। |
| 4 | पृथ्वीदेव प्रथम | 1065 – 1095 | ‘सकलकोसलाधिपति’ की उपाधि; तुम्माण में पृथ्वीदेवेश्वर मंदिर। |
| 5 | जाजल्लदेव प्रथम | 1095 – 1120 | सबसे प्रतापी शासक; जांजगीर बसाया; सोने के सिक्के चलाए। |
| 6 | रत्नदेव द्वितीय | 1120 – 1135 | त्रिपुरी से पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त की। |
| 7 | पृथ्वीदेव द्वितीय | 1135 – 1165 | सर्वाधिक अभिलेख प्राप्त; साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार। |
| 8 | जाजल्लदेव द्वितीय | 1165 – 1168 | त्रिपुरी के आक्रमण को विफल किया। |
| 9 | जगतदेव | 1168 – 1178 | राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखा। |
| 10 | रत्नदेव तृतीय | 1178 – 1198 | सेनापति गंगाधर राव ने लखनेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार किया। |
| 11 | प्रतापमल्ल | 1198 – 1222 | चक्राकार और षट्कोणीय तांबे के सिक्के मिले। |
| ~200 वर्षों का अंधकार युग | |||
| 12 | बाहरेंद्र साय | 1480 – 1525 | अंधकार युग के बाद सत्ता संभाली; कोसगई में किला बनवाया। |
| 13 | कल्याण साय | 1544 – 1581 | अकबर के समकालीन; राजस्व और गोटिया व्यवस्था को सुदृढ़ किया। |
| 14 | रघुनाथ सिंह | 1732 – 1745 | अंतिम स्वतंत्र शासक; मराठों के सामने आत्मसमर्पण किया। |
छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश ने एक लंबी अवधि तक शासन किया। आइए उनके सभी प्रमुख और गौण शासकों को कालक्रमानुसार समझते हैं:
रतनपुर के कलचुरि वंश की संपूर्ण वंशावली (विस्तृत विश्लेषण)
छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश ने एक लंबी अवधि तक शासन किया। आइए उनके सभी प्रमुख और गौण शासकों को कालक्रमानुसार समझते हैं:
1. कलिंगराज (1000 – 1020 ई.)
इन्हें छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश का संस्थापक माना जाता है। इन्होंने अपनी प्रारंभिक राजधानी तुम्माण (वर्तमान कोरबा जिले में) को बनाया।
2. कमलराज (1020 – 1045 ई.)
कलिंगराज के पुत्र कमलराज ने अपने पिता की नीतियों को जारी रखा और त्रिपुरी के कलचुरि शासक गांगेयदेव के उत्कल (उड़ीसा) अभियान में सहायता की।
3. रत्नदेव प्रथम / रत्नराज (1045 – 1065 ई.)
एक दूरदर्शी शासक, जिन्होंने 1050 ई. में तुम्माण के स्थान पर रतनपुर को अपनी नई राजधानी बनाया। उन्होंने रतनपुर को तालाबों का शहर बनाया, प्रसिद्ध महामाया मंदिर का निर्माण करवाया और अपनी शक्ति का विस्तार किया।
4. पृथ्वीदेव प्रथम (1065 – 1095 ई.)
इन्होंने ‘सकलकोसलाधिपति’ की उपाधि धारण की और तुम्माण में पृथ्वीदेवेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया। इन्होंने अपने राज्य को सुरक्षित और सुदृढ़ किया।
5. जाजल्लदेव प्रथम (1095 – 1120 ई.)
यह रतनपुर के कलचुरि वंश के सबसे प्रतापी और शक्तिशाली शासकों में से एक थे। इन्होंने अपने नाम पर जाजल्यपुर (आधुनिक जांजगीर) नगर की स्थापना की और वहाँ विष्णु मंदिर का निर्माण करवाया।
इन्होंने अपने नाम से सोने और तांबे के सिक्के चलाए जिन पर ‘श्रीमद् जाजल्लदेव’ और ‘गजशार्दूल’ (हाथी-सिंह) का चिह्न अंकित था।
6. रत्नदेव द्वितीय (1120 – 1135 ई.)
इन्होंने त्रिपुरी के कलचुरियों से अपनी अधीनता को पूरी तरह समाप्त कर एक स्वतंत्र सत्ता स्थापित की। इन्होंने गंगवंशी शासक अनंतवर्मन चोडगंग के आक्रमण को सफलतापूर्वक विफल किया।
7. पृथ्वीदेव द्वितीय (1135 – 1165 ई.)
इनका शासनकाल कलचुरि साम्राज्य के विस्तार का शिखर था। इनके सर्वाधिक (लगभग 13) अभिलेख प्राप्त हुए हैं। इन्होंने भी ‘सकलकोसलाधिपति’ की उपाधि धारण की।
8. जाजल्लदेव द्वितीय (1165 – 1168 ई.)
इनके शासनकाल में त्रिपुरी के कलचुरि शासक जयसिंह ने आक्रमण किया, जिसे इनके पराक्रमी सामंत उल्हणदेव ने विफल कर दिया।
9. जगतदेव (1168 – 1178 ई.)
इनके शासनकाल में भी राज्य की सीमाएं सुरक्षित रहीं।
10. रत्नदेव तृतीय (1178 – 1198 ई.)
इनके शासनकाल में इनके सेनापति गंगाधर राव ने खरोद के लखनेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।
11. प्रतापमल्ल (1198 – 1222 ई.)
इनके शासनकाल में पहली बार तांबे के चक्राकार और षट्कोणीय सिक्के मिले। इनके बाद लगभग 200 वर्षों तक का काल ‘अंधकार युग’ माना जाता है, क्योंकि कोई स्पष्ट ऐतिहासिक जानकारी नहीं मिलती।
12. बाहरेंद्र साय (1480 – 1525 ई.)
अंधकार युग के बाद इन्होंने सत्ता संभाली। इन्होंने रतनपुर के साथ-साथ कोसगई और छुरी में भी किले बनवाए। इन्होंने रायपुर के कलचुरि शासकों को अपने अधीन किया।
13. कल्याण साय (1544 – 1581 ई.)
यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण शासक थे। वे मुगल सम्राट अकबर के समकालीन थे और ‘आइने-अकबरी’ के अनुसार, लगभग 8 वर्षों तक दिल्ली में रहे। वहाँ से लौटकर उन्होंने मुगल प्रणाली से प्रेरित होकर छत्तीसगढ़ में राजस्व प्रणाली को व्यवस्थित किया और ‘गोटिया’ व्यवस्था को सुदृढ़ किया।
14. रघुनाथ सिंह (1732 – 1745 ई.)
यह रतनपुर का कलचुरि वंश के अंतिम स्वतंत्र शासक थे। इनके शासनकाल में 1741 में मराठा सेनापति भास्कर पंत ने आक्रमण किया और इन्होंने बिना युद्ध किए आत्मसमर्पण कर दिया।
छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश के शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण शासकों को क्रम से याद रखना अक्सर मुश्किल होता है। इस आसान ट्रिक को आजमाएं:
“कमल रत्न-जड़ित पृथ्वी पर जाल बिछाता है।”
इस वाक्य से शुरुआती 5 शासकों का क्रम याद रखें:
- कमल → कलिंगराज (संस्थापक) और कमलराज (उसका पुत्र)
- रत्न → रत्नदेव प्रथम
- पृथ्वी → पृथ्वीदेव प्रथम
- जाल → जाजल्लदेव प्रथम
| शासक | सबसे महत्वपूर्ण योगदान |
|---|---|
| कलिंगराज | तुम्माण को राजधानी बनाकर वंश की स्थापना की। |
| रत्नदेव प्रथम | रतनपुर नगर बसाया और महामाया मंदिर का निर्माण करवाया। |
| जाजल्लदेव प्रथम | जांजगीर (जाजल्यपुर) बसाया और सोने के सिक्के चलाए। |
| पृथ्वीदेव द्वितीय | सर्वाधिक अभिलेख, ‘सकलकोसलाधिपति’ की उपाधि, साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार। |
| कल्याण साय | अकबर के समकालीन, राजस्व (गोटिया) व्यवस्था को सुदृढ़ किया। |
| रघुनाथ सिंह | अंतिम शासक, मराठों के सामने आत्मसमर्पण किया। |
36 गढ़ व्यवस्था: छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक नींव
**छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश** अपनी अनूठी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए जाना जाता है, जिसने इस क्षेत्र को “छत्तीसगढ़” नाम दिया। कल्याण साय ने इस व्यवस्था को राजस्व वसूली के लिए और भी सुदृढ़ किया।
- राज्य: पूरा कलचुरि साम्राज्य।
- गढ़: एक गढ़ में औसतन 84 गाँव होते थे। इसका प्रमुख ‘दीवान’ या ‘गढ़पति’ कहलाता था।
- बारहों: एक गढ़ के अंदर 12-12 गाँवों के समूह होते थे, जिन्हें ‘बारहों’ कहा जाता था। इसका प्रमुख ‘दाऊ’ कहलाता था।
- गाँव: सबसे छोटी इकाई, जिसका प्रमुख ‘गोटिया’ होता था, जो राजस्व वसूली के लिए जिम्मेदार था।
विशेष तथ्य: रायपुर की लहुरी (छोटी) शाखा
14वीं शताब्दी के अंत में, रतनपुर के कलचुरि शासक लक्ष्मीदेव के पुत्र केशवदेव ने रायपुर को केंद्र बनाकर कलचुरि वंश की एक अलग शाखा की स्थापना की। यह शाखा रतनपुर की मुख्य शाखा के अधीन थी। रायपुर शाखा के अंतिम शासक अमर सिंह थे, जिन्हें मराठों ने पराजित किया।
36 गढ़ों की सूची
| शिवनाथ नदी के उत्तर में 18 गढ़ | शिवनाथ नदी के दक्षिण में 18 गढ़ |
|---|---|
| 1. रतनपुर | 1. रायपुर |
| 2. मारो | 2. पाटन |
| 3. विजयपुर | 3. सिमगा |
| 4. पंडरभट्ठा | 4. सिंगारपुर |
| 5. सेमरिया | 5. लवन |
| 6. मदनपुर (चांपा) | 6. अमेरा |
| 7. खरौद | 7. दुर्ग |
| 8. कोटगढ़ | 8. सारधा |
| 9. नवागढ़ | 9. सिरसा |
| 10. सोंठी | 10. मोहंदी |
| 11. ओखर | 11. खल्लारी |
| 12. पेंड्रा | 12. सिरपुर |
| 13. मातिन | 13. फिंगेश्वर |
| 14. उपरोड़ा | 14. राजिम |
| 15. लाफागढ़ | 15. सिंघनगढ़ |
| 16. केंदा | 16. सुवरमार |
| 17. छुरी | 17. टेंगनागढ़ |
| 18. कोसगई | 18. अकलवाड़ा |
- विभाजन का आधार: शिवनाथ नदी (18 गढ़ उत्तर में, 18 गढ़ दक्षिण में)।
- गढ़ (84 गाँव): प्रमुख को ‘दीवान’ कहा जाता था।
- बारहों (12 गाँव): प्रमुख को ‘दाऊ’ कहा जाता था।
- गाँव (1 गाँव): प्रमुख को ‘गोटिया’ कहा जाता था।
कला, धर्म और स्थापत्य: कलचुरि विरासत
**छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश** अपनी स्थापत्य और धार्मिक विरासत के लिए भी जाना जाता है।
- धर्म: छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश मुख्य रूप से **शैव धर्म** के अनुयायी थे और ‘गजशार्दूल’ उनका राजचिह्न था, लेकिन उन्होंने वैष्णव और अन्य संप्रदायों को भी संरक्षण दिया।
- स्थापत्य: छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश के मंदिर निर्माण की शैली नागर शैली से प्रभावित थी। उन्होंने मंदिरों और तालाबों के निर्माण पर बहुत जोर दिया। **’लखौरी ईंटों’** (पतली, छोटी ईंटें) का प्रयोग उनकी वास्तुकला की एक प्रमुख विशेषता है।
- प्रमुख निर्माण: रतनपुर का महामाया मंदिर, जांजगीर का विष्णु मंदिर, पाली का शिव मंदिर, और तुम्माण का वंकेश्वर मंदिर।
- त्रिपुरी से संबंध विच्छेद: रत्नदेव द्वितीय इतने शक्तिशाली हो गए थे कि उन्होंने अपनी मूल शाखा त्रिपुरी के कलचुरियों को कर (Tax) देना बंद कर दिया और स्वयं को एक पूरी तरह से स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। यह एक बेटे द्वारा अपने पिता के घर से अलग होने जैसा था!
- रायपुर शाखा की शुरुआत: 14वीं शताब्दी के अंत में, रतनपुर के कलचुरि शासक लक्ष्मीदेव के पुत्र केशवदेव ने रायपुर में कलचुरि वंश की एक अलग लहुरी (छोटी) शाखा की स्थापना की। इसी वजह से हमें रायपुर और रतनपुर में अलग-अलग कलचुरि शासकों का इतिहास पढ़ने को मिलता है।
- कल्याण साय और जहांगीर: कल्याण साय सिर्फ अकबर से ही नहीं मिले थे। एक कहानी के अनुसार, बाद में मुगल सम्राट जहांगीर ने उन्हें किसी विवाद के कारण 8 वर्षों तक दिल्ली में कैद रखा था। इसी दौरान उन्होंने मुगल प्रशासन को और भी करीब से जाना था।
- गोपल्ला गीत का रहस्य: छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोकगीत ‘गोपल्ला गीत’ में कलचुरि शासक कल्याण साय और हीरा खान के बीच हुए संघर्ष का मार्मिक वर्णन मिलता है। यह गीत इतिहास को लोककथाओं में जीवित रखने का एक अद्भुत उदाहरण है।
ये तथ्य दिखाते हैं कि छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश सिर्फ किलों और मंदिरों का निर्माता नहीं था, बल्कि उनकी कहानियाँ आज भी छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में जीवित हैं।
- मुख्य धर्म: शैव धर्म (उपासक), राजचिह्न – गजशार्दूल।
- निर्माण शैली: नागर शैली से प्रभावित।
- प्रमुख विशेषता: ‘लखौरी ईंटों’ (पतली और छोटी ईंटें) का प्रयोग।
- मुख्य निर्माण: महामाया मंदिर (रतनपुर), विष्णु मंदिर (जांजगीर), शिव मंदिर (पाली)।
कलचुरि सत्ता का पतन और मराठों का आगमन
18वीं शताब्दी तक, आंतरिक कलह और कमजोर उत्तराधिकारियों के कारण **छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश** बहुत कमजोर हो गया था। 1741 में, नागपुर के मराठा शासक रघुजी प्रथम के सेनापति **भास्कर पंत** ने रतनपुर पर एक आसान आक्रमण कर अंतिम कलचुरि शासक रघुनाथ सिंह को पराजित कर दिया।
इस प्रकार, छत्तीसगढ़ में लगभग 750 वर्षों के लंबे और गौरवशाली छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश एवं कलचुरि शासन का अंत हो गया और मराठा शासन की शुरुआत हुई।
त्वरित रिवीजन: परीक्षा के लिए मुख्य तथ्य
| विषय | महत्वपूर्ण जानकारी |
|---|---|
| संस्थापक | कलिंगराज (राजधानी: तुम्माण) |
| रतनपुर के संस्थापक | रत्नदेव प्रथम |
| 36 गढ़ व्यवस्था | शिवनाथ नदी के उत्तर (18) और दक्षिण (18) में विभाजित। |
| प्रशासनिक प्रमुख | गढ़ (दीवान), बारहों (दाऊ), गाँव (गोटिया) |
| अकबर के समकालीन | कल्याण साय |
| अंतिम शासक | रघुनाथ सिंह |
| पतन का कारण | 1741 में मराठा सेनापति भास्कर पंत का आक्रमण। |
संदर्भ और स्रोत (References and Sources)
इस लेख में प्रस्तुत जानकारी को विश्वसनीय और प्रामाणिक स्रोतों से सत्यापित किया गया है ताकि आपको परीक्षा के लिए सबसे सटीक जानकारी मिल सके।
पुरातात्विक और साहित्यिक स्रोत
- विभिन्न कलचुरि कालीन अभिलेख: (जैसे पृथ्वीदेव द्वितीय का राजिम शिलालेख, जाजल्लदेव प्रथम का रतनपुर अभिलेख)
- ‘आइने-अकबरी’: (कल्याण साय के मुगल दरबार से संबंधों की जानकारी के लिए)
आधुनिक प्रकाशन एवं वेबसाइटें
- छत्तीसगढ़ वृहत संदर्भ (छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी): (छत्तीसगढ़ के भूगोल और इतिहास पर सबसे प्रामाणिक प्रकाशनों में से एक) – यह एक भौतिक प्रकाशन है।
- छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड (आधिकारिक वेबसाइट): (राज्य के प्रमुख पुरातात्विक स्थलों जैसे सिरपुर और रतनपुर की आधिकारिक जानकारी के लिए) [आधिकारिक वेबसाइट]
- बिलासपुर जिला – पर्यटन स्थल: (रतनपुर और मल्हार जैसे कलचुरि कालीन स्थलों की जानकारी के लिए बिलासपुर जिले की आधिकारिक वेबसाइट) [आधिकारिक वेबसाइट]
💬 आपकी राय: **छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश** का सबसे बड़ा योगदान क्या था – उनका लंबा शासन, 36 गढ़ों की व्यवस्था, या छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश के द्वारा बनाए गए मंदिर? कमेंट्स में अपनी राय दें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
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