छत्तीसगढ़ का संपूर्ण इतिहास: 2025 की अंतिम गाइड (CGPSC के लिए)

छत्तीसगढ़ का संपूर्ण इतिहास (Chhattisgarh Ka Sampurna Itihas)

📝 परिचय

छत्तीसगढ़ का संपूर्ण इतिहास (Chhattisgarh Ka Sampurna Itihas) केवल राजाओं और तारीखों की कहानी नहीं, बल्कि ‘धान के कटोरे’ की उस आत्मा की कहानी है जो समय के साथ विकसित हुई है। यह उस भूमि का इतिहास है जिसने पाषाण युग के पहले मानवों की कला को चट्टानों पर सहेजा और 21वीं सदी में भारत के एक प्रगतिशील राज्य के रूप में अपनी पहचान बनाई।

क्या आप जानते हैं कि भगवान राम की माता कौशल्या की जन्मभूमि यही क्षेत्र था? या कैसे इस धरती पर 36 किलों की एक अनूठी प्रशासनिक व्यवस्था ने इसे “छत्तीसगढ़” नाम दिया?

CGPSC और Vyapam की परीक्षाओं के लिए यह छत्तीसगढ़ का संपूर्ण इतिहास विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह गाइड आपको न केवल तथ्यों से परिचित कराएगी, बल्कि हर कालखंड के गहरे विश्लेषण और उसके महत्व को भी समझाएगी। चलिए, समय की परतों को हटाकर छत्तीसगढ़ के गौरवशाली अतीत की इस यात्रा पर निकलते हैं।

विषय सूची [x]

🔥 लेख एक नज़र में (At a Glance)
  • कालखंड: पाषाण काल से लेकर 1 नवंबर 2000 को राज्य बनने तक का विस्तृत सफर।
  • स्वर्ण काल: सिरपुर के पांडु वंश का शासन, जब यह क्षेत्र कला और ज्ञान का वैश्विक केंद्र था।
  • नामकरण: कलचुरि राजवंश की 36 गढ़ों की अनूठी प्रशासनिक व्यवस्था की देन।
  • प्रमुख विद्रोह: शहीद वीर नारायण सिंह (1857) और गुंडाधुर के नेतृत्व में भूमकाल विद्रोह (1910)।
  • विश्लेषण: हर काल की राजनीतिक घटनाओं के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहलुओं का गहन विश्लेषण।

1. छत्तीसगढ़ का इतिहास: एक नजर में (समयरेखा)

छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक घटनाक्रम को संक्षेप में समझने के लिए नीचे दी गई समयरेखा देखें:

कालखंडमहत्वपूर्ण घटना/शासकमुख्य केंद्र
प्रागैतिहासिक कालशैलचित्रों का निर्माण, पाषाण युगीन औजारसिंघनपुर, कबड़ा पहाड़ (रायगढ़)
प्राचीन काल (4थी-12वीं सदी)शरभपुरीय, पांडु (स्वर्ण काल), नल और सोम वंशसिरपुर, मल्हार, बस्तर
मध्य काल (1000-1741 ई.)कलचुरि वंश, 36 गढ़ों की स्थापना, काकतीय वंशतुम्माण, रतनपुर, रायपुर, बारसूर
मराठा काल (1741-1854 ई.)भोंसले शासक, सूबा शासन प्रणालीरतनपुर, रायपुर
ब्रिटिश काल (1854-1947 ई.)वीर नारायण सिंह का विद्रोह, भूमकाल विद्रोहरायपुर, सोनाखान, बस्तर
आधुनिक काल (2000-)1 नवंबर 2000 को नए राज्य का गठनरायपुर (राजधानी)

2. प्रागैतिहासिक काल: जब पत्थरों पर उकेरा गया इतिहास

छत्तीसगढ़ का सम्पूर्ण इतिहास मानव सभ्यता के शुरुआती दिनों से जुड़ा है। रायगढ़ जिले की सिंघनपुर और कबड़ा पहाड़ की गुफाएं एक टाइम मशीन की तरह हैं, जहाँ हमारे पूर्वजों ने शिकार, नृत्य और अपने जीवन को चट्टानों पर जीवंत कर दिया।

मुख्य स्थल और साक्ष्य:

  • प्रमुख गुफाएं: सिंघनपुर, कबड़ा पहाड़, बोतल्दा (रायगढ़), धनपुर (गौरेला-पेंड्रा-मरवाही), अर्जुनी (दुर्ग)। विस्तृत जानकारी के लिए आप छत्तीसगढ़ की गुफाएं पढ़ सकते हैं।
  • पुरातात्विक साक्ष्य: इन स्थलों से न केवल शैलचित्र, बल्कि पाषाणकालीन हस्तकुठार (Hand-axe) और खुरचनी जैसे पत्थर के औजार भी मिले हैं।
  • खोज: इन शैलचित्रों की खोज 1910 में अंग्रेज इंजीनियर सी. एंडरसन ने की थी, जिसने इस क्षेत्र को वैश्विक पुरातात्विक मानचित्र पर ला दिया।

वैदिक काल में यह क्षेत्र ‘दक्षिण कोसल’ के नाम से विख्यात हुआ। रामायण में इसका उल्लेख इस बात का प्रमाण है कि यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही भारत की मुख्य सांस्कृतिक धारा का हिस्सा रहा है।

🔥 क्या आप जानते हैं?
सिंघनपुर की गुफाओं के शैलचित्र स्पेन और मैक्सिको की प्रागैतिहासिक कला से समानता रखते हैं, जो मानव सभ्यता के वैश्विक विकास की एक कड़ी को दर्शाते हैं।

2.1 पौराणिक काल: रामायण और महाभारत में छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ का इतिहास केवल पत्थरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति के महाकाव्यों, रामायण और महाभारत का भी एक अभिन्न अंग रहा है।

रामायण काल (दक्षिण कोसल और दंडकारण्य)

रामायण काल में छत्तीसगढ़ का उत्तरी भाग ‘दक्षिण कोसल’ और दक्षिणी भाग (बस्तर) ‘दंडकारण्य’ कहलाता था। यह भगवान राम की माता कौशल्या की जन्मभूमि है, इसीलिए छत्तीसगढ़ में भांजा (भांचा) को राम का स्वरूप मानकर पैर छूने की परंपरा है।

  • चंदखुरी (रायपुर): यहाँ माता कौशल्या का विश्व का एकमात्र प्राचीन मंदिर स्थित है।
  • शिवरीनारायण: मान्यताओं के अनुसार, यहीं पर भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर खाए थे।
  • दंडकारण्य: भगवान राम ने अपने वनवास का अधिकांश समय (लगभग 10 वर्ष) बस्तर के इन्हीं घने जंगलों में ऋषियों की रक्षा करते हुए बिताया था।

महाभारत काल

महाभारत काल में इस क्षेत्र का उल्लेख ‘प्राक्कोसल’ या ‘कोसल’ के रूप में मिलता है।

  • रतनपुर: इसका प्राचीन नाम ‘मणिपुर’ था, जहाँ के राजा ताम्रध्वज का युद्ध अर्जुन के साथ हुआ था।
  • आरंग: इसे मोरध्वज की नगरी कहा जाता है। लोककथाओं के अनुसार, यहीं पर राजा मोरध्वज ने कृष्ण की परीक्षा के लिए अपने पुत्र का बलिदान दिया था (आरा से अंग काटने के कारण नाम ‘आरंग’ पड़ा)।
🔥 महत्वपूर्ण लिंक
छत्तीसगढ़ की पौराणिक संस्कृति और पर्यटन स्थलों को गहराई से जानने के लिए पढ़ें: छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्यटन स्थल

3. प्राचीन इतिहास: साम्राज्यों की छाया और स्थानीय राजवंशों का स्वर्ण काल

मौर्य, सातवाहन और गुप्त जैसे बड़े साम्राज्यों के प्रभाव ने इस क्षेत्र को वृहत्तर भारत से जोड़ा, जिसके बाद स्थानीय राजवंशों ने छत्तीसगढ़ की अपनी विशिष्ट पहचान गढ़ी।

साम्राज्यवादी प्रभाव:

  • मौर्यकाल: सरगुजा की जोगीमारा गुफाओं में मिले ब्राह्मी लिपि के लेख और आरंग (रायपुर) से प्राप्त आहत सिक्के।
  • सातवाहन काल: रायगढ़ से राजा अपीलक की मुद्रा और मल्हार से सातवाहन कालीन लेख।
  • गुप्त काल: समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में दक्षिण कोसल के राजा महेन्द्र और महाकांतार (बस्तर) के राजा व्याघ्रराज की हार का उल्लेख है।

प्रमुख स्थानीय राजवंशों का उदय

  1. राजर्षितुल्य कुल वंश (4थी-6वीं शताब्दी): आरंग को राजधानी बनाकर शासन करने वाला यह पहला ज्ञात स्थानीय राजवंश था।
  2. नल वंश (4थी-12वीं शताब्दी): बस्तर क्षेत्र में केंद्रित इस वंश का वाकाटकों से लंबा संघर्ष चला।
  3. शरभपुरीय वंश (5वीं-6वीं शताब्दी): शासक प्रसन्नमात्र द्वारा सोने के सिक्के जारी करना आर्थिक समृद्धि का प्रमाण है।
  4. पांडु वंश (6वीं-8वीं शताब्दी – स्वर्ण काल): इनके शासनकाल को छत्तीसगढ़ का ‘स्वर्ण काल’ कहा जाता है। महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासन में सिरपुर ज्ञान, कला और धर्म का एक अंतरराष्ट्रीय केंद्र बन गया। रानी वासटा द्वारा बनवाया गया विश्व प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर इसी युग की देन है।
अधिक जानें
महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासन और सिरपुर के वैभव के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए हमारा लेख पढ़ें: छत्तीसगढ़ का स्वर्ण काल: पांडु वंश का इतिहास

4. मध्यकालीन इतिहास: कलचुरि, मराठा और ‘छत्तीसगढ़’ नाम का उदय

4.1 छत्तीसगढ़ का कलचुरि वंश (1000 – 1741 ई.)

यह छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक समय तक शासन करने वाला राजवंश था। इनकी मुख्य शाखा रतनपुर में (संस्थापक- कलिंगराज) और दूसरी शाखा रायपुर में (संस्थापक- केशव देव) स्थापित हुई।

सबसे बड़ा योगदान: उन्होंने अपने राज्य को शिवनाथ नदी के उत्तर में 18 और दक्षिण में 18, कुल 36 गढ़ों (किलों) में विभाजित किया। इसी व्यवस्था के कारण इस भू-भाग का नाम “छत्तीसगढ़” पड़ा। स्थापत्य कला में उन्होंने रतनपुर का महामाया मंदिर बनवाया।

4.2 बस्तर का काकतीय (चालुक्य) वंश

जब मैदानी भाग में कलचुरि थे, तब बस्तर के जंगलों में वारंगल से आए अन्नम देव ने काकतीय वंश की स्थापना की। विश्व प्रसिद्ध 75 दिनों का बस्तर दशहरा इसी वंश के राजा पुरुषोत्तम देव ने शुरू किया था।

4.3 मराठा शासन (1741 – 1854 ई.)

नागपुर के भोंसले शासकों ने कलचुरियों को हराकर सत्ता हथियाई। मराठा शासन के दौरान ‘सूबा शासन’ प्रणाली लागू की गई, जो जनता के लिए काफी कष्टकारी साबित हुई।

5. आधुनिक इतिहास: स्वतंत्रता की ज्वाला और नायक

1854 में ब्रिटिश शासन आने के बाद, यहाँ के आदिवासियों और किसानों ने कभी भी गुलामी स्वीकार नहीं की। यह संघर्ष छत्तीसगढ़ के इतिहास का सबसे गौरवशाली अध्याय है।

प्रमुख विद्रोह और आंदोलन

विद्रोह/आंदोलनवर्षप्रमुख नेतृत्वकर्ता
परलकोट विद्रोह1825गेंदसिंह
सोनाखान विद्रोह1857शहीद वीर नारायण सिंह
सिपाही विद्रोह1858हनुमान सिंह (छत्तीसगढ़ के मंगल पांडे)
भूमकाल विद्रोह1910वीर गुंडाधुर (बस्तर)
कंडेल नहर सत्याग्रह1920बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव (गांधीजी का आगमन)
जंगल सत्याग्रह1922-30विभिन्न स्थानीय नेता

सविनय अवज्ञा आंदोलन और छत्तीसगढ़ के ‘जंगल सत्याग्रह’

1930 के दशक में जब गांधीजी ने नमक कानून तोड़ा, तब छत्तीसगढ़ के पास समुद्र नहीं था। इसलिए यहाँ के आदिवासियों और किसानों ने अंग्रेजों के ‘वन कानूनों’ को तोड़ने का निर्णय लिया। इसे ही ‘जंगल सत्याग्रह’ कहा जाता है। यह जल, जंगल और जमीन पर अपने अधिकार की लड़ाई थी।

प्रमुख जंगल सत्याग्रहों का विवरण:

  • गट्टासिल्ली सत्याग्रह (जून 1930): धमतरी जिले में हुए इस सत्याग्रह का नेतृत्व नारायण राव मेघावाले और बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव ने किया। यहाँ अंग्रेजों ने मवेशियों को कांजी हाउस में बंद कर दिया था, जिसे मुक्त कराने के लिए यह आंदोलन हुआ।
  • रुद्री-नवागांव सत्याग्रह (अगस्त 1930): इसे छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक सत्याग्रह माना जाता है। पुलिस की गोलीबारी में ‘मिन्टू कुमार’ और ‘रलू’ नामक सत्याग्रही शहीद हो गए थे।
  • तमोरा सत्याग्रह (सितंबर 1930): महासमुंद के इस सत्याग्रह की सबसे खास बात यह थी कि इसमें एक बालिका ‘दयावती’ ने वन अधिकारी को तमाचा मारकर साहस का परिचय दिया था।
विस्तृत अध्ययन
इन आंदोलनों के हर पहलू और नायकों के बारे में विस्तार से जानने के लिए हमारा यह आर्टिकल पढ़ें: छत्तीसगढ़ के प्रमुख जंगल सत्याग्रह: कारण और परिणाम

इन विद्रोहों के अलावा जंगल सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन में भी छत्तीसगढ़ ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। गांधीजी के आगमन और कंडेल नहर सत्याग्रह ने यहाँ राष्ट्रीय चेतना जगाई।

छत्तीसगढ़ का प्रशासनिक विकास: 1861 से 1956 तक

छत्तीसगढ़ का इतिहास केवल राजाओं का नहीं, बल्कि सीमाओं के बदलाव का भी इतिहास है। ब्रिटिश काल से लेकर स्वतंत्रता तक, इस क्षेत्र के मानचित्र में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए जो आज की प्रशासनिक व्यवस्था की नींव हैं। विस्तृत जानकारी के लिए आप छत्तीसगढ़ का प्रशासनिक ढांचा पढ़ सकते हैं।

महत्वपूर्ण प्रशासनिक पड़ाव

वर्षघटनाक्रमपरिणाम
2 नवंबर 1861मध्य प्रांत (Central Province) का गठनछत्तीसगढ़ एक संभाग बना (मुख्यालय: रायपुर)। इसमें 3 जिले थे- रायपुर, बिलासपुर और संबलपुर।
1862संभाग प्रणाली लागूछत्तीसगढ़ एक स्वतंत्र संभाग बना और चार्ल्स सी. इलियट प्रथम उपायुक्त (Deputy Commissioner) बने।
1905बंगाल विभाजन का प्रभावयह छत्तीसगढ़ के मानचित्र का सबसे बड़ा बदलाव था। संबलपुर उड़ीसा में चला गया और कोरिया, चांगभखार, सरगुजा, उदयपुर और जशपुर रियासतें छत्तीसगढ़ में शामिल हुईं।
1948रियासतों का विलीनीकरणभारत की स्वतंत्रता के बाद 14 देशी रियासतों को मिलाकर बस्तर, रायगढ़ और सरगुजा नए जिले बनाए गए।
1956मध्य प्रदेश का गठन1 नवंबर 1956 को मध्य प्रदेश बना और छत्तीसगढ़ उसका हिस्सा बन गया।

यह कालखंड इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 1905 में ही छत्तीसगढ़ का वह भौगोलिक स्वरूप (Map) तैयार हुआ जिसे हम आज देखते हैं।

5.1 छत्तीसगढ़ की स्थापत्य कला और मुद्रा इतिहास

इतिहास सिर्फ युद्धों से नहीं बनता, बल्कि वहां की कला और सिक्कों से भी पहचाना जाता है। छत्तीसगढ़ के राजवंशों ने स्थापत्य कला में अमिट छाप छोड़ी है।

मंदिर निर्माण की शैलियाँ

छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से ‘नागर शैली’ के मंदिर पाए जाते हैं।

  • ईंटों के मंदिर: सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर (पांडु वंश) भारत के सर्वोत्तम लाल ईंटों से बने मंदिरों में से एक है। इसकी नक्काशी आज भी पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती है।
  • प्रस्तर (पत्थर) मंदिर: कवर्धा का भोरमदेव मंदिर (फणिनाग वंश) अपनी कामुक मूर्तिकला के कारण ‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो’ कहलाता है।
  • देवरानी-जेठानी मंदिर: तालागांव (बिलासपुर) स्थित यह मंदिर छत्तीसगढ़ का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है, जहाँ ‘रुद्रशिव’ की अद्भुत प्रतिमा मिली है जिसके अंगों में विभिन्न जीव-जंतु उकेरे गए हैं।

प्राचीन मुद्राएं (Coins of Chhattisgarh)

सिक्के इतिहास का सबसे सच्चा प्रमाण होते हैं।

  • मल्हार और बिलासपुर: यहाँ से सातवाहन राजाओं की मुद्राएं मिली हैं, जिनमें ‘गामिडस’ लिखा हुआ है।
  • सोने के सिक्के: नल वंश और शरभपुरीय वंश के शासकों (जैसे प्रसन्नमात्र) ने गरुड़ शंख युक्त सोने के सिक्के चलाए, जो उस समय की संपन्नता को दर्शाते हैं।
  • कलचुरि सिक्के: इनके सिक्कों पर ‘गजलक्ष्मी’ का अंकन मिलता है, जो राज्य की समृद्धि का प्रतीक था।
🔥 संस्कृति और कला
छत्तीसगढ़ की शिल्पकला और मंदिरों के बारे में और अधिक जानकारी के लिए यह पढ़ें: छत्तीसगढ़ की शिल्पकला और स्थापत्य

6. एक नए राज्य का गठन

पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की मांग दशकों पुरानी थी। डॉ. खूबचंद बघेल और अन्य नेताओं के प्रयासों के फलस्वरूप, 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ भारत का 26वां राज्य बना।

🔥 विस्तृत अध्ययन
राज्य निर्माण के पूरे संघर्ष और घटनाक्रम को जानने के लिए पढ़ें: पृथक छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण का इतिहास

7. सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहर

छत्तीसगढ़ का इतिहास इसकी संस्कृति में रचा-बसा है। ऐतिहासिक राजवंशों ने यहाँ की कला को प्रभावित किया:

  • स्थापत्य कला: सिरपुर (बौद्ध/हिंदू), मल्हार (शैव/शाक्त), और कवर्धा का भोरमदेव मंदिर (नागर शैली)।
  • जनजातीय संस्कृति: इतिहास के पन्नों में यहाँ की जनजातियों का विशेष योगदान रहा है, जिन्होंने अपनी परंपराओं को आज तक जीवित रखा है।
  • लोक कला: पंडवानी, पंथी और छत्तीसगढ़ के लोक नृत्य यहाँ के समृद्ध अतीत की कहानियां कहते हैं।

छत्तीसगढ़ का ‘प्रथम शहीद’ किसे माना जाता है?

  • वीर नारायण सिंह
  • गुंडाधुर
  • गेंदसिंह
  • हनुमान सिंह

किस राजवंश के काल को छत्तीसगढ़ का ‘स्वर्ण काल’ कहा जाता है?

  • कलचुरि वंश
  • नल वंश
  • पांडु वंश
  • सोम वंश

‘छत्तीसगढ़’ नामकरण का संबंध किस राजवंश की प्रशासनिक व्यवस्था से है?

  • मराठा
  • काकतीय
  • कलचुरि
  • मौर्य

बस्तर का महान ‘भूमकाल विद्रोह’ किस वर्ष हुआ था?

  • 1857
  • 1910
  • 1876
  • 1920

छत्तीसगढ़ राज्य का गठन कब हुआ?

  • 1 नवंबर 2001
  • 15 नवंबर 2000
  • 1 नवंबर 2000
  • 26 जनवरी 2000

📚 संदर्भ और स्रोत (References & Sources)

इस लेख में प्रस्तुत ऐतिहासिक तथ्य और जानकारी विभिन्न प्रतिष्ठित पुस्तकों, शोध पत्रों और सरकारी दस्तावेजों पर आधारित है। पाठकों की विश्वसनीयता के लिए मुख्य स्रोत नीचे दिए गए हैं:

  • मानक पुस्तकें: ‘छत्तीसगढ़ का इतिहास’ (डॉ. प्यारेलाल गुप्त) एवं ‘छत्तीसगढ़ बृहद् सन्दर्भ’ (उपकार प्रकाशन)।
  • पुरातात्विक रिपोर्ट: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग द्वारा प्रकाशित लेख।
  • आधिकारिक वेबसाइट: ऐतिहासिक स्थलों और स्मारकों की वर्तमान स्थिति की पुष्टि के लिए आप छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल (Chhattisgarh Tourism Board) की आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं।

निष्कर्ष

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ का संपूर्ण इतिहास हमें सिखाता है कि इस भूमि की असली ताकत इसकी जड़ों, इसकी संस्कृति और इसके लोगों के संघर्ष में निहित है। पाषाणकालीन शैलाश्रयों से लेकर आधुनिक राज्य बनने तक का यह सफर अद्भुत है। यदि आप और गहराई से जानना चाहते हैं, तो छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति पर हमारा लेख जरूर पढ़ें।

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