छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ: एक सम्पूर्ण एवं विस्तृत विश्लेषण (Ultimate Guide)
छत्तीसगढ़ की आत्मा उसकी आदिम संस्कृति, घने जंगलों और यहाँ निवास करने वाली जनजातियों के सरल जीवन में बसती है। राज्य की कुल आबादी का लगभग एक-तिहाई हिस्सा जनजातीय है, जो इसे भारत का ‘जनजातीय हृदय’ बनाता है। ये जनजातियाँ सिर्फ एक जनसांख्यिकीय आँकड़ा नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं, अनूठी कलाओं, लोक नृत्यों और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की एक जीवित विरासत हैं। M S WORLD The WORLD of HOPE में आपका स्वागत है, और आज हम छत्तीसगढ़ की इसी अमूल्य जनजातीय विरासत का अब तक का सबसे गहन और विस्तृत विश्लेषण करेंगे।
यह एक ‘क्लस्टर पोस्ट’ है, जो हमारे छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति पिलर का एक अभिन्न अंग है। इस लेख का लक्ष्य CGPSC, Vyamap और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए छत्तीसगढ़ की जनजातियों से संबंधित हर एक तथ्य, हर एक परंपरा और हर एक महत्वपूर्ण पहलू को पूरी गहराई से कवर करना है। इसमें हम न केवल प्रमुख जनजातियों का विस्तृत अध्ययन करेंगे, बल्कि उनकी सामाजिक संरचना, आर्थिक जीवन, सांस्कृतिक विशेषताओं और संवैधानिक प्रावधानों को भी समझेंगे।
तो तैयार हो जाइए, घोटुल के रहस्यों से लेकर अबूझमाड़ के अज्ञात जंगलों तक, और भूमकाल के विद्रोह से लेकर आज के संवैधानिक अधिकारों तक, छत्तीसगढ़ की जनजातियों की इस अविश्वसनीय यात्रा पर निकलने के लिए।
इस लेख में आप क्या पढ़ेंगे?
- छत्तीसगढ़ में जनजातीय जनसांख्यिकी (2011 के अनुसार)
- छत्तीसगढ़ की जनजातियों का वर्गीकरण
- प्रमुख जनजातियाँ: एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक सारणी
- प्रमुख जनजातियों का विस्तृत विश्लेषण
- विशेष पिछड़ी जनजातियाँ (PVTGs)
- जनजातीय संस्कृति के विशिष्ट पहलू
- महत्वपूर्ण जनजातीय शब्दावली (परीक्षा हेतु)
- संवैधानिक प्रावधान एवं संरक्षण
- निष्कर्ष
- स्रोत और संदर्भ
- ज्ञान की परीक्षा: जनजाति क्विज़
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. छत्तीसगढ़ में जनजातीय जनसांख्यिकी (2011 के अनुसार)
छत्तीसगढ़ की पहचान एक जनजातीय बहुल राज्य के रूप में है। जनगणना 2011 के अनुसार, राज्य की जनजातीय जनसंख्या से संबंधित महत्वपूर्ण आँकड़े निम्नलिखित हैं, जो परीक्षाओं का आधार हैं:
| मानदंड (Metric) | आंकड़े (Data) | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|---|
| कुल जनजातीय जनसंख्या | 78,22,902 | यह राज्य की कुल जनसंख्या का 30.62% है। |
| लिंगानुपात (जनजातियों में) | 1020 (प्रति 1000 पुरुषों पर) | यह राज्य के औसत (991) और राष्ट्रीय औसत (943) दोनों से काफी बेहतर है। |
| साक्षरता दर (जनजातियों में) | 59% | यह राज्य की औसत साक्षरता (70.28%) से कम है, जो एक चुनौती है। |
| सर्वाधिक जनजातीय जनसंख्या वाला जिला | सरगुजा (संख्या के अनुसार) | सुकमा (प्रतिशत के अनुसार) |
| न्यूनतम जनजातीय जनसंख्या वाला जिला | नारायणपुर (संख्या के अनुसार) | रायपुर (प्रतिशत के अनुसार) |
2. छत्तीसगढ़ की जनजातियों का वर्गीकरण
छत्तीसगढ़ में 42 से अधिक प्रकार की जनजातियाँ पाई जाती हैं, जिन्हें 161 उप-समूहों में विभाजित किया गया है। इन्हें भाषा, निवास क्षेत्र और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।
-
भाषा के आधार पर:
- मुंडा भाषा परिवार: कोरकू, बिरहोर, निहाल जैसी जनजातियाँ इस परिवार की भाषाएँ बोलती हैं।
- द्रविड़ भाषा परिवार: गोंड (गोंडी), उरांव (कुड़ुख), और दोरला जैसी जनजातियाँ इस परिवार की भाषाएँ बोलती हैं।
- आर्य भाषा परिवार: कंवर, हल्बा, और बैगा जैसी जनजातियाँ छत्तीसगढ़ी और आर्य परिवार की अन्य बोलियों का उपयोग करती हैं।
- विशेष पिछड़ी जनजातियाँ (PVTGs): भारत सरकार ने सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से अत्यंत पिछड़े 7 जनजातीय समूहों को यह दर्जा दिया है। इनमें से 5 छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा और 2 केंद्र सरकार द्वारा घोषित हैं।
छत्तीसगढ़ की प्रमुख जनजातियाँ: एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक सारणी
यह मास्टर सारणी छत्तीसगढ़ की प्रमुख जनजातियों और उनकी सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विशेषताओं को एक ही स्थान पर प्रस्तुत करती है। यह CGPSC और Vyapam परीक्षाओं के लिए त्वरित रिवीज़न हेतु अत्यंत उपयोगी है।
| जनजाति | युवा गृह | प्रमुख देवता | प्रमुख नृत्य / पर्व | विवाह पद्धति / अन्य तथ्य |
|---|---|---|---|---|
| गोंड | घोटुल (मुरिया उपजाति) | बूढ़ादेव, दूल्हादेव, अंगादेव | करमा, सैला, मेघनाद पर्व | दूध लौटावा, पठौनी, सेवा विवाह (लमसेना)। |
| उरांव | धूमकुरिया | सरना देवी | सरहुल नृत्य | कुड़ुख बोली बोलते हैं; गाँव का मुखिया ‘महतो’ कहलाता है। |
| बैगा | – | बूढ़ादेव | करमा, बिलमा, परघौनी | गोदना प्रिय; ‘बेवार’ कृषि; धरती पर हल चलाना वर्जित। (PVTG) |
| कंवर | – | सगराखण्ड | बार नृत्य | स्वयं को कौरवों का वंशज मानते हैं; सैन्य कार्य करते थे। |
| हल्बा | – | – | – | कृषक जनजाति; पोहा (चिवड़ा) बनाने का कार्य करते हैं। |
| माड़िया | – | अंगादेव | गौर नृत्य (बाइसन हॉर्न) | मृतक स्तंभ (गुड़ी) की परंपरा; बस्तर में निवास। |
| कमार | – | – | – | बांस शिल्प में निपुण; पंचायत प्रमुख ‘कुरहा’। (PVTG) |
| बिरहोर | गीत-ओना | – | – | घुमंतू जनजाति; ‘जंगल का आदमी’; रस्सी निर्माण। (PVTG) |
| भुंजिया | – | – | – | पवित्र रसोई घर ‘लाल बंगला’; रोग का इलाज गर्म लोहे से दागकर। |
3. प्रमुख जनजातियों का विस्तृत विश्लेषण
छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ अपनी अनूठी सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक संरचना और इतिहास के लिए जानी जाती हैं। आइए, राज्य की कुछ सबसे प्रमुख जनजातियों का गहराई से अध्ययन करें।
A. गोंड जनजाति
गोंड छत्तीसगढ़ की जनजातियों में सबसे बड़ा समूह है, जो राज्य की कुल जनजातीय जनसंख्या का लगभग 56% हैं। वे स्वयं को ‘कोइतोर’ (पर्वतवासी मनुष्य) कहते हैं और पूरे राज्य में फैले हुए हैं।
- उत्पत्ति और भाषा: ‘गोंड’ शब्द की उत्पत्ति तेलुगु शब्द ‘कोंड’ से हुई है, जिसका अर्थ ‘पर्वत’ होता है। इनकी मुख्य बोली ‘गोंडी’ है, जो द्रविड़ भाषा परिवार से संबंधित है।
- सामाजिक संरचना: गोंड समाज पितृसत्तात्मक होता है और कई गोत्रों में विभाजित है। उनमें ‘दूध लौटावा’ (ममेरे-फुफेरे भाई-बहन में विवाह) की प्रथा प्रचलित है।
- अर्थव्यवस्था: परंपरागत रूप से, गोंड स्थायी कृषि करते हैं। कुछ उप-समूह (जैसे अबूझमाड़िया) ‘पेद्दा’ या ‘दीप्पा’ कृषि (स्थानांतरित कृषि) भी करते हैं।
-
प्रमुख उप-जनजातियाँ:
- राज गोंड: यह गोंडों का सर्वोच्च और शासक वर्ग माना जाता है।
- मुरिया: बस्तर में निवास करने वाली यह जनजाति अपने ‘घोटुल’ नामक युवा गृह के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
- माड़िया: बस्तर में निवास करने वाली यह जनजाति अपने ‘गौर नृत्य’ के लिए जानी जाती है, जिसमें वे गौर भैंस के सींग का मुकुट पहनते हैं।
- अबूझमाड़िया: नारायणपुर के अबूझमाड़ क्षेत्र में निवास करने वाली यह एक विशेष पिछड़ी जनजाति है।
- प्रमुख देवता एवं पर्व: गोंडों के प्रमुख देवता ‘बूढ़ादेव’ हैं, जो साल वृक्ष में निवास करते हैं। इसके अलावा, वे ‘दूल्हादेव’ और ‘अंगादेव’ की भी पूजा करते हैं। उनका प्रमुख पर्व ‘मेघनाद’ है।
B. कंवर जनजाति
कंवर जनजाति, छत्तीसगढ़ का दूसरा सबसे बड़ा जनजातीय समूह है, जो मुख्य रूप से सरगुजा, बिलासपुर, रायगढ़ और रायपुर संभाग में निवास करते हैं। छत्तीसगढ़ की जनजातियों में इनका एक महत्वपूर्ण स्थान है।
- उत्पत्ति: वे अपना संबंध महाभारत के ‘कौरवों’ से मानते हैं और स्वयं को क्षत्रिय वंश का मानते हैं।
- सामाजिक संरचना: कंवर समाज कई उप-जातियों में बंटा हुआ है। उनका समाज पितृसत्तात्मक होता है।
- अर्थव्यवस्था: परंपरागत रूप से, कंवर कृषि कार्य करते हैं। वर्तमान में, वे शिक्षित होकर शासकीय सेवाओं में भी बड़ी संख्या में कार्यरत हैं।
- प्रमुख देवता एवं पर्व: उनके प्रमुख देवता ‘सगराखण्ड’ हैं। वे सामान्य हिंदू देवी-देवताओं की भी पूजा करते हैं और छत्तीसगढ़ के सभी प्रमुख त्योहारों को मनाते हैं।
C. उरांव जनजाति
उरांव जनजाति, छत्तीसगढ़ की एक शिक्षित और उन्नत जनजाति मानी जाती है, जो मुख्य रूप से सरगुजा, जशपुर और रायगढ़ जिलों में निवास करती है।
- भाषा: वे ‘कुड़ुख’ बोली बोलते हैं, जो द्रविड़ भाषा परिवार से संबंधित है।
- सामाजिक संरचना: उरांव समाज में 14 गोत्र पाए जाते हैं। उनके युवा गृह को ‘धूमकुरिया’ कहा जाता है, जहाँ युवक-युवतियों को सामाजिक और पारंपरिक शिक्षा दी जाती है।
- प्रमुख देवता एवं पर्व: उनके प्रमुख देवता ‘सरना देवी’ हैं, जो साल वृक्ष में निवास करती हैं। उनका सबसे महत्वपूर्ण पर्व ‘सरहुल’ है, जो चैत्र माह में साल वृक्ष पर फूल आने पर मनाया जाता है।
- प्रमुख नृत्य: सरहुल नृत्य के अलावा, वे करमा और अन्य मौसमी नृत्य भी करते हैं।
D. बैगा जनजाति
बैगा जनजाति अपनी अनूठी संस्कृति, गोदना प्रियता और औषधियों के पारंपरिक ज्ञान के लिए जानी जाती है। वे मुख्य रूप से कवर्धा, मुंगेली, राजनांदगांव और बिलासपुर जिलों की मैकल पर्वत श्रेणी में निवास करते हैं। यह छत्तीसगढ़ की जनजातियों में एक विशेष स्थान रखती है।
- अर्थव्यवस्था: परंपरागत रूप से, वे ‘बेवार’ या ‘दाहिया’ (स्थानांतरित कृषि) करते थे, लेकिन अब स्थायी कृषि की ओर बढ़ रहे हैं। वे जंगल से वनोपज संग्रह भी करते हैं।
-
सांस्कृतिक पहचान:
- गोदना प्रियता: बैगा महिलाओं में गोदना गुदवाने की परंपरा बहुत गहरी है, जिसे वे एक स्थायी आभूषण मानती हैं।
- ‘Priesthood’: उन्हें अन्य जनजातियों के लिए ‘पुरोहित’ या ‘पुजारी’ का कार्य करने वाली जनजाति माना जाता है।
- भूमि पर हल चलाना वर्जित: वे धरती को अपनी माँ मानते हैं और परंपरागत रूप से उस पर हल चलाना पाप समझते थे।
- प्रमुख देवता एवं पर्व: उनके प्रमुख देवता ‘बूढ़ादेव’ हैं। उनका प्रमुख नृत्य ‘करमा’ और ‘बिलमा’ है।
E. हल्बा जनजाति
हल्बा एक आर्थिक और सामाजिक रूप से उन्नत जनजाति है, जो मुख्य रूप से बस्तर, कांकेर, दुर्ग और रायपुर जिलों में पाई जाती है।
- उत्पत्ति और भाषा: वे अपनी उत्पत्ति ‘हल’ से मानते हैं। वे छत्तीसगढ़ी, हल्बी और मराठी बोलियों का प्रयोग करते हैं।
- अर्थव्यवस्था: वे कुशल कृषक माने जाते हैं और पोहा (चिवड़ा) बनाने के कार्य में विशेष रूप से संलग्न हैं।
- सामाजिक स्थिति: कबीरपंथ से प्रभावित होने के कारण, हल्बा समाज में सामाजिक चेतना और शिक्षा का स्तर अपेक्षाकृत उच्च है।
4. विशेष पिछड़ी जनजातियाँ (Primitive Vulnerable Tribal Groups – PVTGs)
भारत सरकार ने कुछ जनजातीय समूहों को उनकी घटती जनसंख्या, आदिम जीवन शैली, निम्न साक्षरता और आर्थिक पिछड़ेपन के कारण ‘विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों’ (PVTGs) के रूप में चिन्हित किया है। छत्तीसगढ़ में कुल सात ऐसी जनजातियाँ हैं, जिनमें से पाँच राज्य सरकार द्वारा और दो (अतिरिक्त) केंद्र सरकार द्वारा घोषित हैं।
केंद्र सरकार द्वारा घोषित (5): अबूझमाड़िया, कमार, पहाड़ी कोरवा, बिरहोर, बैगा।
राज्य सरकार द्वारा घोषित (2): भुंजिया, पंडो।
A. अबूझमाड़िया
- निवास क्षेत्र: यह जनजाति मुख्य रूप से नारायणपुर जिले के दुर्गम ‘अबूझमाड़’ क्षेत्र में निवास करती है, जिसे ‘छत्तीसगढ़ का चेरापूंजी’ भी कहा जाता है।
- संस्कृति और अर्थव्यवस्था: वे अपनी आदिम और बाहरी दुनिया से अलग-थलग संस्कृति के लिए जाने जाते हैं। वे ‘पेद्दा’ या ‘दीप्पा’ नामक स्थानांतरित कृषि करते हैं। उनका ‘ककसार’ नृत्य एक प्रसिद्ध पारंपरिक नृत्य है।
B. कमार
- निवास क्षेत्र: यह जनजाति मुख्य रूप से गरियाबंद जिले के देवभोग और मैनपुर क्षेत्र में केंद्रित है।
- संस्कृति और अर्थव्यवस्था: उनकी पंचायत के मुखिया को ‘कुरहा’ कहा जाता है। वे बांस शिल्प में अत्यधिक निपुण होते हैं और इससे बनी वस्तुओं का विक्रय कर अपनी आजीविका चलाते हैं। उनमें ‘घोड़े को छूना’ वर्जित माना जाता है।
C. पहाड़ी कोरवा
- निवास क्षेत्र: यह जनजाति मुख्य रूप से सरगुजा, जशपुर और कोरबा जिलों के पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करती है।
- संस्कृति और अर्थव्यवस्था: वे अपनी आक्रामक और आत्मनिर्भर प्रकृति के लिए जाने जाते हैं। वे ‘दहिया’ नामक स्थानांतरित कृषि करते हैं। उनमें ‘मृतक संस्कार’ की एक अनूठी ‘नवाधानी’ प्रथा है।
D. बिरहोर
- निवास क्षेत्र: यह एक घुमंतू जनजाति है जो मुख्य रूप से जशपुर और रायगढ़ जिलों में पाई जाती है। ‘बिरहोर’ का अर्थ है ‘जंगल का आदमी’।
- संस्कृति और अर्थव्यवस्था: वे रस्सी बनाने के लिए ‘चोप’ की छाल का उपयोग करने में माहिर होते हैं। उनके युवा गृह को ‘गीत-ओना’ कहा जाता है।
E. बैगा
- निवास क्षेत्र: मैकल पर्वत श्रेणी (कवर्धा, मुंगेली, राजनांदगांव)।
- विशेष तथ्य: यद्यपि बैगा एक प्रमुख जनजाति है, उनके अत्यधिक पिछड़ेपन और विशिष्ट संस्कृति के कारण उन्हें PVTG का दर्जा भी दिया गया है। वे औषधियों के पारंपरिक ज्ञाता और गोदना प्रिय होते हैं।
5. जनजातीय संस्कृति के विशिष्ट पहलू
छत्तीसगढ़ की जनजातियों की कुछ ऐसी सांस्कृतिक प्रथाएं हैं जो उन्हें अद्वितीय बनाती हैं और जिनसे परीक्षाओं में अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं।
A. युवा गृह (Youth Dormitory)
युवा गृह जनजातीय समाज की एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था है, जहाँ अविवाहित युवक-युवतियों को सामाजिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक शिक्षा दी जाती है।
| युवा गृह का नाम | संबंधित जनजाति | पुरुष सदस्य | महिला सदस्य | मुख्य मुखिया |
|---|---|---|---|---|
| घोटुल | मुरिया / गोंड | चेलिक | मोटियारिन | सिरेदार (पुरुष) / बेलोसा (महिला) |
| धूमकुरिया | उरांव | धांगर | धांगरिन | धांगर महतो |
| गीत-ओना | बिरहोर | – | – | – |
B. विवाह पद्धतियाँ
जनजातीय समाज में विवाह की कई पारंपरिक पद्धतियाँ प्रचलित हैं:
- पठौनी विवाह: इसमें वधू पक्ष वर पक्ष के घर बारात लेकर जाता है।
- सेवा विवाह (लमसेना): इसमें वर, वधू-मूल्य चुकाने के लिए अपने होने वाले ससुर के घर सेवा करता है।
- अपहरण विवाह (पायसोतुर): युवक द्वारा युवती का अपहरण कर विवाह करना।
- दूध लौटावा: ममेरे-फुफेरे भाई-बहन के बीच विवाह, जो गोंड जनजाति में प्रचलित है।
- विनिमय विवाह (गुरावट): वधु-मूल्य से बचने के लिए दो परिवारों के बीच बहनों का आदान-प्रदान।
C. देवी-देवता एवं पर्व
- प्रमुख देवता: अधिकांश जनजातियों के सर्वोच्च देवता ‘बूढ़ादेव’ हैं, जो साल वृक्ष में निवास करते हैं। ‘अंगादेव’ (काष्ठ निर्मित देव) और ‘दूल्हादेव’ (बीमारियों से रक्षा करने वाले देव) भी पूजे जाते हैं।
- प्रमुख पर्व: ‘सरहुल’ (उरांव), ‘ककसार’ (अबूझमाड़िया), और ‘मेघनाद’ (गोंड) जनजातियों के विशिष्ट पर्व हैं। ‘माटी तिहार’ बस्तर में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण कृषि पर्व है।
- रसोई घर (Lal Bangla): भुंजिया जनजाति में रसोई घर को ‘लाल बंगला’ कहा जाता है, जिसे वे अत्यंत पवित्र मानते हैं और इसमें बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश वर्जित होता है।
6. महत्वपूर्ण जनजातीय शब्दावली (परीक्षा हेतु)
प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर जनजातीय जीवन से जुड़ी विशिष्ट शब्दावलियों पर प्रश्न पूछे जाते हैं। यह सारणी रिवीज़न के लिए अत्यंत उपयोगी है।
| शब्दावली | अर्थ / विवरण | संबंधित जनजाति |
|---|---|---|
| घोटुल | युवा गृह (सामाजिक शिक्षा केंद्र) | मुरिया |
| धूमकुरिया | युवा गृह | उरांव |
| लाल बंगला | पवित्र रसोई घर | भुंजिया |
| पेद्दा / दीप्पा | स्थानांतरित कृषि | अबूझमाड़िया / गोंड |
| बेवार / दाहिया | स्थानांतरित कृषि | बैगा |
| कुरहा | जाति पंचायत का मुखिया | कमार |
| पायसोतुर | अपहरण विवाह | गोंड |
| लमसेना | सेवा विवाह | गोंड, बैगा |
| दूध लौटावा | ममेरे-फुफेरे भाई-बहन में विवाह | गोंड |
| सल्फी | सल्फी वृक्ष के रस से बना पेय पदार्थ | माड़िया (बस्तर) |
| घड़वा कला | मोम-क्षय पद्धति से धातु शिल्प (ढोकरा) | घड़वा (बस्तर) |
| मृतक स्तंभ / गुड़ी | मृतक की स्मृति में लगाया गया काष्ठ स्तंभ | माड़िया (बस्तर) |
7. संवैधानिक प्रावधान एवं संरक्षण
भारत का संविधान जनजातियों के अधिकारों की रक्षा करने और उनके सामाजिक-आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए कई विशेष प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 342: इस अनुच्छेद के तहत, राष्ट्रपति को किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में जनजातियों को ‘अनुसूचित जनजाति’ (Scheduled Tribe) के रूप में अधिसूचित करने का अधिकार है।
- पांचवीं अनुसूची (Fifth Schedule): यह छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में ‘अनुसूचित क्षेत्रों’ और ‘अनुसूचित जनजातियों’ के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित है। यह जनजातीय सलाहकार परिषद (Tribes Advisory Council) की स्थापना का प्रावधान करती है और राज्यपाल को विशेष अधिकार देती है।
- पेसा कानून (PESA Act, 1996): ‘पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम’ ग्राम सभा को अपने क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों पर महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान करता है।
- वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act, 2006): यह कानून जनजातियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों को उनकी पैतृक भूमि और वन संसाधनों पर अधिकार प्रदान करता है।
निष्कर्ष
अंततः, छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ सिर्फ एक जनसांख्यिकीय समूह नहीं, बल्कि राज्य की आत्मा और उसकी सबसे जीवंत सांस्कृतिक विरासत हैं। घोटुल की सामाजिक शिक्षा से लेकर भूमकाल के विद्रोह तक, और गोदना की कला से लेकर संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई तक, उनका इतिहास संघर्ष, résilience और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव की एक गाथा है। एक छात्र के लिए, इन जनजातियों को समझना सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के हृदय को समझने के लिए भी अनिवार्य है। यह विस्तृत विश्लेषण उस समझ की दिशा में एक ठोस कदम है, जो भविष्य के और भी गहन अध्ययनों के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है।
स्रोत और संदर्भ (Sources & References)
यह लेख गहन शोध और विश्वसनीय स्रोतों पर आधारित है ताकि आपको सबसे सटीक जानकारी प्रदान की जा सके। छत्तीसगढ़ की जनजातियों पर और अधिक विस्तृत और आधिकारिक अध्ययन के लिए आप निम्नलिखित संसाधनों का उल्लेख कर सकते हैं:
- आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग, छत्तीसगढ़: यह छत्तीसगढ़ सरकार की आधिकारिक वेबसाइट है, जहाँ राज्य की प्रमुख जनजातियों, उनकी योजनाओं और सांस्कृतिक विरासत पर विस्तृत और आधिकारिक जानकारी उपलब्ध है।
- जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार: यह भारत सरकार का आधिकारिक जनजातीय पोर्टल है, जो देश भर की जनजातियों, संवैधानिक प्रावधानों और राष्ट्रीय स्तर की योजनाओं पर प्रामाणिक जानकारी प्रदान करता है।
- “छत्तीसगढ़ वृहद संदर्भ” – डॉ. परदेशी राम वर्मा: यह पुस्तक छत्तीसगढ़ के इतिहास, भूगोल और संस्कृति पर एक प्रामाणिक ग्रंथ मानी जाती है, जिसका उपयोग कई छात्र और शोधकर्ता करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी जनजाति कौन सी है?
गोंड जनजाति छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी जनजातीय समूह है, जो राज्य की कुल जनजातीय जनसंख्या का लगभग 56% (जनगणना 2011 के अनुसार) है।
प्रश्न 2: ‘विशेष पिछड़ी जनजाति’ (PVTG) का क्या अर्थ है?
यह भारत सरकार द्वारा चिन्हित ऐसे जनजातीय समूह हैं जो घटती जनसंख्या, आदिम जीवन शैली, निम्न साक्षरता और आर्थिक पिछड़ेपन जैसे मानकों पर अन्य जनजातियों से भी अधिक पिछड़े हुए हैं। छत्तीसगढ़ में अबूझमाड़िया, कमार, पहाड़ी कोरवा, बिरहोर और बैगा केंद्र द्वारा घोषित PVTGs हैं।
प्रश्न 3: ‘घोटुल’ और ‘धूमकुरिया’ क्या हैं?
ये जनजातीय समाज के ‘युवा गृह’ हैं। ‘घोटुल’ मुरिया जनजाति से संबंधित है, जबकि ‘धूमकुरिया’ उरांव जनजाति का युवा गृह है। ये संस्थाएं अविवाहित युवक-युवतियों के लिए सामाजिक और सांस्कृतिक शिक्षा के केंद्र के रूप में कार्य करती हैं।
प्रश्न 4: ‘लाल बंगला’ किस जनजाति से संबंधित है और इसका क्या महत्व है?
‘लाल बंगला’ भुंजिया जनजाति से संबंधित है और यह उनके रसोई घर को दिया गया नाम है। वे इसे अत्यंत पवित्र मानते हैं और इसमें अपने परिवार के सदस्यों के अलावा किसी बाहरी व्यक्ति को प्रवेश करने की अनुमति नहीं देते हैं।
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