छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति: एक सम्पूर्ण परिदृश्य (Ultimate Guide)
यदि छत्तीसगढ़ का भूगोल छत्तीसगढ़ का भूगोल उसकी देह है, तो छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति उसकी आत्मा है। यह वह अदृश्य धागा है जो यहाँ के लोगों को उनके इतिहास, उनकी परंपराओं और उनकी धरती से जोड़ता है। हरेली की हरियाली से लेकर बस्तर के दशहरा की भव्यता तक, छत्तीसगढ़ की संस्कृति हर कदम पर जीवन का उत्सव मनाती है। M S WORLD The WORLD of HOPE में आपका स्वागत है, और आज हम छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति के जीवंत और बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत की गहराई में उतरेंगे।
यह एक ‘पिलर पोस्ट’ है, जिसका उद्देश्य CGPSC, Vyapam और अन्य परीक्षाओं के लिए छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति के हर महत्वपूर्ण पहलू का एक व्यापक और संपूर्ण अवलोकन प्रदान करना है। यह लेख आपको छत्तीसगढ़ का जनजातीय जीवन, लोक नृत्यों, गीतों, पर्वों, शिल्पों और साहित्य का एक समग्र परिचय देगा, जिससे इस विषय पर आपकी समझ गहरी और विस्तृत हो सके।
भविष्य में, इस छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति पिलर पोस्ट में बताए गए प्रत्येक विषय पर एक और भी गहन ‘क्लस्टर पोस्ट’ आएगा। उन सभी विस्तृत लेखों को खोजने के लिए, आप हमारी समर्पित छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति श्रेणी पर जा सकते हैं। चलिए, इस सांस्कृतिक यात्रा की शुरुआत करते हैं!
इस लेख में आप क्या पढ़ेंगे?
1. छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति: एक विस्तृत परिचय
छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति की नींव यहाँ की समृद्ध जनजातीय विरासत पर रखी गई है। राज्य की लगभग एक-तिहाई आबादी (30.62%) जनजातीय है, जो इसे भारत के सबसे प्रमुख जनजातीय राज्यों में से एक बनाती है। यहाँ 42 से अधिक प्रकार की जनजातियाँ निवास करती हैं, जिन्हें उनकी अनूठी परंपराओं, भाषाओं और जीवन शैली के लिए जाना जाता है।
नवीनतम आँकड़े और परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य:
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए, जनजातीय जनसंख्या का आधार **जनगणना 2011** को ही माना जाता है, जिसके अनुसार राज्य में ST जनसंख्या का प्रतिशत 30.62% था। हालांकि, यह समझना महत्वपूर्ण है कि राज्य की कुल जनसंख्या, जो 2011 में 2.55 करोड़ थी, 2023 में अनुमानित रूप से 3.02 करोड़ हो गई है।
इसका अर्थ है कि जनजातीय आबादी की कुल संख्या भी बढ़ी है और अब यह अनुमानित रूप से 92.5 लाख से अधिक है। प्रतिशत के लिहाज़ से यह अभी भी कुल जनसंख्या का लगभग 30-31% ही है। जब तक अगली जनगणना के आँकड़े नहीं आते, परीक्षाओं में प्रतिशत के लिए 30.62% का आँकड़ा ही प्रामाणिक माना जाएगा। इसी प्रकार, गोंड जनजाति 2011 के अनुसार सबसे बड़ा समूह थी और आज भी वही स्थिति बनी हुई है।
प्रमुख जनजातीय समूह:
- गोंड: यह छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा और भारत का दूसरा सबसे बड़ा जनजातीय समूह है। वे पूरे राज्य में फैले हुए हैं और उनकी कई उप-शाखाएं हैं जैसे मुरिया, माड़िया, और अबूझमाड़िया। उनके प्रमुख देवता ‘बूढ़ादेव’ हैं।
- उरांव: यह जनजाति मुख्य रूप से सरगुजा, जशपुर और रायगढ़ जिलों में निवास करती है। इनका युवा गृह ‘धूमकुरिया’ कहलाता है और इनका प्रमुख नृत्य ‘सरहुल’ है।
- बैगा: यह जनजाति विशेष रूप से कवर्धा, मुंगेली और बिलासपुर के मैकल पर्वत श्रेणी क्षेत्र में पाई जाती है। वे गोदना के लिए प्रसिद्ध हैं और उन्हें ‘Priesthood’ का कार्य करने वाली जनजाति माना जाता है।
- कंवर: यह जनजाति मुख्य रूप से बिलासपुर, रायपुर और रायगढ़ में निवास करती है। वे अपना संबंध कौरवों से मानते हैं।
- हल्बा: यह जनजाति मुख्य रूप से बस्तर, दुर्ग और रायपुर में पाई जाती है। वे आर्थिक रूप से उन्नत माने जाते हैं और कृषि कार्य में संलग्न हैं।
छत्तीसगढ़ की प्रमुख जनजातियाँ: एक मास्टर टेबल
यह सारणी रिवीज़न के लिए प्रमुख जनजातियों और उनकी मुख्य विशेषताओं को एक स्थान पर प्रस्तुत करती है।
| जनजाति | निवास क्षेत्र | युवा गृह | प्रमुख नृत्य/पर्व | विशेष तथ्य |
|---|---|---|---|---|
| मुरिया | बस्तर (नारायणपुर) | घोटुल | मांदरी, गौर, ककसार | घोटुल के लिए प्रसिद्ध। |
| उरांव | सरगुजा, जशपुर | धूमकुरिया | सरहुल | कुड़ुख बोली बोलते हैं। |
| बिरहोर | रायगढ़, जशपुर | गीत-ओना | – | बांस शिल्प में निपुण। (PVTG) |
| कमार | गरियाबंद, धमतरी | – | – | बांस शिल्प में निपुण; गोदना प्रिय। (PVTG) |
| अबूझमाड़िया | नारायणपुर | – | ककसार | ‘मेटा भूम’ कृषि (Penda Krishi) करते हैं। (PVTG) |
| बैगा | मैकल श्रेणी (कवर्धा) | – | करमा, बिलमा | गोदना प्रिय; ‘बेवार’ कृषि करते हैं। (PVTG) |
जनजातीय जीवन की अनूठी परंपराएं
जनजातीय समाज कई अनूठी परंपराओं का पालन करता है जो उनकी सांस्कृतिक पहचान हैं:
- पेय पदार्थ: ‘पेज’ (चावल का मांड) और ‘हंडिया’ (चावल की शराब) उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। सल्फी वृक्ष के रस से बना ‘सल्फी’ बस्तर का लोकप्रिय पेय है।
- विवाह पद्धति: ‘पठौनी विवाह’ (लड़की बारात लेकर जाती है), ‘दूध लौटावा’ (ममेरे-फुफेरे भाई-बहन में विवाह), ‘अपहरण विवाह’ (पायसोतुर), और ‘सेवा विवाह’ (लमसेना) जैसी पद्धतियाँ प्रचलित हैं।
- मृतक स्तंभ: बस्तर की माड़िया जनजाति में मृतक की याद में लकड़ी का एक अलंकृत स्तंभ गाड़ने की परंपरा है, जिसे ‘गुड़ी’ या ‘मृतक स्तंभ’ कहते हैं।
(नोट: छत्तीसगढ़ की जनजातियों पर एक विस्तृत ‘क्लस्टर पोस्ट’ जल्द ही प्रकाशित किया जाएगा।)
2. छत्तीसगढ़ की प्रदर्शन कलाएं
छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति का सबसे जीवंत रूप यहाँ की प्रदर्शन कलाओं में देखने को मिलता है। लोक नृत्य, गीत और नाट्य यहाँ के लोगों के दैनिक जीवन, उनकी आस्था और उनके उत्सवों का अभिन्न अंग हैं।
A. प्रमुख लोक नृत्य
छत्तीसगढ के लोक नृत्य ऊर्जा, लय और सामूहिकता का प्रतीक हैं, जो विभिन्न अवसरों पर किए जाते हैं।
| नृत्य का नाम | अवसर / समुदाय | मुख्य विशेषता / वेशभूषा | प्रमुख वाद्ययंत्र |
|---|---|---|---|
| पंथी नृत्य | सतनामी समुदाय द्वारा (गुरु घासीदास जयंती पर) | आध्यात्मिक नृत्य; कलाकार सफेद धोती पहनते हैं और पिरामिड बनाते हैं। (कलाकार: देवदास बंजारे) | मांदर, झांझ |
| राउत नाचा | यादव (राउत) समुदाय द्वारा (दीपावली के बाद) | शौर्य और कृष्ण भक्ति का प्रतीक; कलाकार रंग-बिरंगी वेशभूषा पहनते हैं और दोहे गाते हैं। | गड़वा-बाजा, टिमकी |
| सुआ नृत्य | महिलाओं द्वारा (दीपावली के समय) | वियोग श्रृंगार प्रधान नृत्य; महिलाएं टोकरी में रखे मिट्टी के तोते (सुआ) के चारों ओर नृत्य करती हैं। | – (केवल ताली की थाप पर) |
| करमा नृत्य | गोंड, बैगा, उरांव जनजातियों द्वारा (विजयादशमी पर) | कर्म देवता को प्रसन्न करने के लिए स्त्री-पुरुषों का सामूहिक नृत्य। | मांदर, टिमकी |
| सैला नृत्य | सरगुजा और बिलासपुर के पुरुष (शरद पूर्णिमा पर) | डंडा नृत्य का एक रूप, जिसमें नर्तक हाथ में डंडा लेकर नृत्य करते हैं। | मांदर |
| गौर नृत्य | माड़िया जनजाति द्वारा (जात्रा पर्व पर) | ‘शिकार का अभिनय’ नृत्य; नर्तक गौर भैंस के सींग से बना ‘कौड़ी’ सिर पर पहनते हैं। (कलाकार: वेरियर एल्विन ने इसे ‘विश्व का सबसे सुंदर नृत्य’ कहा है) | मांदर |
B. प्रमुख लोक गीत
छत्तीसगढ़ के लोक गीत यहाँ की संस्कृति का दर्पण हैं, जिनमें प्रेम, विरह, भक्ति और सामाजिक जीवन की झलक मिलती है।
- पंडवानी: यह महाभारत की कथा का एक एकल लोकनाट्य-गायन है। इसकी दो शैलियाँ हैं – वेदमती (शास्त्रों पर आधारित, बैठकर गायन) और कापालिक (लोककथाओं पर आधारित, खड़े होकर अभिनय के साथ)। इसकी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार पद्म विभूषण तीजन बाई हैं।
- ददरिया: इसे ‘लोकगीतों का राजा’ कहा जाता है। यह एक प्रेम और श्रृंगार गीत है, जिसे युवक-युवतियाँ खेतों में काम करते समय सवाल-जवाब शैली में गाते हैं।
- भरथरी: यह राजा भरथरी और रानी पिंगला के वैराग्य जीवन की कथा का भावपूर्ण गायन है। इसमें सारंगी और एकतारा वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है। सुरुजबाई खांडे इसकी प्रसिद्ध गायिका थीं।
- बांस गीत: यह यादव समुदाय का एक करुण गीत है, जिसमें महाभारत के पात्र कर्ण और मोरध्वज की कथा गाई जाती है। इसका मुख्य वाद्ययंत्र ‘बांस’ से बना एक लंबा बांसुरी होता है।
- चंदैनी गायन: यह लोरिक और चंदा की प्रेमगाथा का गायन है। चिंतादास इसके प्रमुख गायक हैं।
| लोक गीत | विषय / प्रसंग | प्रमुख कलाकार / समुदाय | मुख्य वाद्ययंत्र / शैली |
|---|---|---|---|
| पंडवानी | महाभारत की कथा | तीजन बाई, झाडूराम देवांगन, रितु वर्मा | तंबूरा, करताल; वेदमती और कापालिक शैली। |
| ददरिया | प्रेम गीत / श्रृंगार | युवक-युवतियाँ (खेतों में काम करते समय) | ‘लोकगीतों का राजा’; सवाल-जवाब शैली। |
| भरथरी | राजा भरथरी और रानी पिंगला का वैराग्य | सुरुजबाई खांडे | सारंगी, एकतारा। |
| बांस गीत | महाभारत के पात्र कर्ण/मोरध्वज की करुण कथा | यादव समुदाय (राउत) | लंबी बांसुरी (बांस), मोहरी। |
| चंदैनी गायन | लोरिक और चंदा की प्रेमगाथा | चिंतादास, रामलाल वर्मा | टिमकी, ढोलक। |
C. प्रमुख लोकनाट्य
- नाचा: यह छत्तीसगढ़ का सबसे प्रसिद्ध लोकनाट्य है, जो गम्मत (प्रहसन), संगीत और नृत्य का मिश्रण है। इसमें ‘परी’ (महिला पात्र) की भूमिका पुरुष निभाते हैं। दुलार सिंह मंदराजी को ‘नाचा का भीष्म पितामह’ कहा जाता है।
- रहस: यह राधा-कृष्ण की रासलीला पर आधारित एक पारंपरिक लोकनाट्य है, जो उत्तरी छत्तीसगढ़ में प्रचलित है।
| लोकनाट्य | विषय / शैली | प्रमुख कलाकार / प्रवर्तक | विशेष तथ्य |
|---|---|---|---|
| नाचा | गम्मत (प्रहसन) और संगीत का मिश्रण | दुलार सिंह मंदराजी, हबीब तनवीर | ‘नाचा का भीष्म पितामह’ – दुलार सिंह मंदराजी। |
| रहस | कृष्ण की रासलीला का मंचन | – | यह उत्तरी छत्तीसगढ़ में प्रचलित एक पारंपरिक लोकनाट्य है। |
| भतरा नाट | पौराणिक कथाओं पर आधारित (उड़िया प्रभाव) | भतरा जनजाति (बस्तर) | यह मुख्य रूप से मनोरंजन के लिए आयोजित किया जाता है। |
(नोट: इन सभी प्रदर्शन कलाओं पर विस्तृत ‘क्लस्टर पोस्ट’ जल्द ही हमारी वेबसाइट पर उपलब्ध होंगे।)
3. छत्तीसगढ़ के पर्व, त्यौहार एवं मेले
छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति यहाँ के त्योहारों में जीवंत हो उठती है, जो कृषि, प्रकृति और स्थानीय मान्यताओं से गहराई से जुड़े हुए हैं।
छत्तीसगढ़ के प्रमुख त्यौहार: एक विस्तृत सारणी
| त्यौहार | कब मनाया जाता है? | क्यों और कैसे मनाया जाता है? (मुख्य बिंदु) |
|---|---|---|
| हरेली | श्रावण अमावस्या | यह कृषि का प्रथम त्यौहार है। किसान अपने कृषि उपकरणों (नागर, गैंती) की पूजा करते हैं। बच्चे ‘गेड़ी’ (बांस का डंडा) पर चढ़ते हैं और घरों के दरवाजों पर नीम की पत्तियां लगाई जाती हैं। |
| भोजली | भादो कृष्ण पक्ष प्रथमा | यह मित्रता का पर्व है। छोटी टोकरियों में बोए गए गेहूं के हरे पौधों (भोजली) को पास के तालाब या नदी में विसर्जित किया जाता है। ‘देवी गंगा’ का गीत गाया जाता है। |
| पोला | भादो अमावस्या | यह भी एक कृषि पर्व है। किसान मिट्टी और लकड़ी से बने बैलों की पूजा करते हैं। बच्चे मिट्टी के बैलों से खेलते हैं और ‘बैल दौड़’ का आयोजन होता है। |
| तीजा (हरतालिका) | भादो शुक्ल पक्ष तृतीया | यह सुहागिन महिलाओं का सबसे बड़ा व्रत है। महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं और भगवान शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। |
| छेरछेरा पुन्नी | पौष माह की पूर्णिमा | यह दान का पर्व है, जो नई फसल के घर आने की खुशी में मनाया जाता है। बच्चे और युवक घर-घर जाकर ‘छेर छेरा, कोठी के धान ला हेर हेरा’ गाते हुए अन्न (धान) मांगते हैं। |
| माटी तिहार | चैत्र माह | यह बस्तर क्षेत्र में मनाया जाने वाला पर्व है। इसमें पृथ्वी देवी की पूजा की जाती है ताकि फसल अच्छी हो। |
| बस्तर का दशहरा | श्रावण अमावस्या से आश्विन शुक्ल त्रयोदशी (75 दिन) | यह विश्व का सबसे लंबा दशहरा है, जो माँ दंतेश्वरी को समर्पित है। इसमें ‘काछिन गादी’, ‘रथ परिक्रमा’ और ‘मुरिया दरबार’ जैसी अनूठी रस्में होती हैं। |
प्रमुख मेले
छत्तीसगढ़ में त्योहारों के अवसर पर कई प्रसिद्ध मेलों का आयोजन होता है, जैसे – राजिम कुंभ (माघी पुन्नी मेला), सिरपुर महोत्सव, शिवरीनारायण मेला, और दंतेवाड़ा की फागुन मंडई।
(नोट: छत्तीसगढ़ के सभी उत्सवों और मेलों पर विस्तृत ‘क्लस्टर पोस्ट’ जल्द ही प्रकाशित किए जाएंगे।)
4. शिल्प कला, आभूषण एवं जीवनशैली
छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति की झलक यहाँ के लोगों की कारीगरी और उनकी पारंपरिक जीवनशैली में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
A. प्रमुख शिल्प कला
छत्तीसगढ़ की जनजातीय शिल्प कला अपनी सादगी, रचनात्मकता और प्रकृति से जुड़ाव के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
छत्तीसगढ़ की प्रमुख शिल्प कलाएं
- ढोकरा शिल्प (घड़वा कला): यह एक प्राचीन धातु शिल्प है जिसमें मोम-क्षय पद्धति (Lost-Wax Casting) का उपयोग किया जाता है। कारीगर पहले मधुमक्खी के मोम से एक आकृति बनाते हैं, उस पर मिट्टी का लेप लगाते हैं, और फिर गर्म पिघली हुई धातु (पीतल, कांसा) डालकर कलाकृति का निर्माण करते हैं। यह मुख्य रूप से बस्तर, कोंडागांव और रायगढ़ में प्रचलित है।
- लौह शिल्प (Loha Shilp): यह बस्तर के अगरिया जनजाति के कारीगरों की पारंपरिक कला है। वे गर्म लोहे को पीट-पीटकर देवी-देवताओं, जानवरों और दैनिक जीवन की वस्तुओं की कलात्मक आकृतियाँ बनाते हैं।
- काष्ठ शिल्प (Wood Craft): बस्तर की मुरिया जनजाति काष्ठ शिल्प में माहिर है। वे अपने घोटुल के स्तंभों, दरवाजों और स्मृति स्तंभों पर सुंदर और जटिल नक्काशी करते हैं।
- तुमा शिल्प: यह लौकी के सूखे खोल (तुमा) का उपयोग करके सजावटी और उपयोगी वस्तुएं बनाने की कला है। इस पर चित्रकारी की जाती है या इसे काटकर सुंदर लैंप और बर्तन बनाए जाते हैं।
- बांस शिल्प (Bamboo Craft): कमार और बिरहोर जनजातियाँ बांस से टोकरियाँ, फर्नीचर, और सजावटी वस्तुएं बनाने में निपुण हैं।
B. प्रमुख आभूषण एवं वेशभूषा
छत्तीसगढ़ के पारंपरिक आभूषण और वेशभूषा यहाँ की सादगी और प्रकृति प्रेम को दर्शाते हैं।
- गोदना: गोदना यहाँ की संस्कृति का एक अभिन्न अंग है, जिसे एक स्थायी आभूषण माना जाता है। बैगा और देवार जनजातियाँ गोदना गोदने की कला के लिए प्रसिद्ध हैं।
- पारंपरिक आभूषण: महिलाएं गले में ‘सुता’, ‘सूतिया’, ‘पुतरी’; नाक में ‘फुल्ली’, ‘बुलाक’; और कलाई में ‘ऐंठी’, ‘पटा’ जैसे पारंपरिक आ-भूषण पहनती हैं, जो आमतौर पर चांदी, गिलट या कांसे से बने होते हैं।
- कौड़ी और सीप के आभूषण: बस्तर की जनजातियों में कौड़ी, सीप और जंगली फूलों से बने आभूषण बहुत लोकप्रिय हैं।
- पारंपरिक वेशभूषा: पुरुषों की पारंपरिक वेशभूषा ‘धोती-कुर्ता’ और सिर पर ‘पगड़ी’ है। महिलाएं ‘लुगड़ा’ (साड़ी) पहनती हैं, जिसे ‘कछोरा’ शैली में पहना जाता है।
B. प्रमुख आभूषण (शरीर के अंगों के अनुसार)
छत्तीसगढ़ की महिलाएं विभिन्न पारंपरिक आभूषणों से अपना श्रृंगार करती हैं, जो आमतौर पर चांदी, गिलट, कांसा या कौड़ी से बने होते हैं। इन्हें शरीर के अंगों के अनुसार वर्गीकृत करना याद रखने का सबसे अच्छा तरीका है।
| शरीर का अंग | आभूषणों के नाम |
|---|---|
| सिर (माथा) | मांगमोती, टिकली, जंगली फूल, कौड़ी |
| नाक | फुल्ली, बुलाक, नथनी, बेसर |
| कान | खिनवा, झुमका, तरकी (कर्णफूल), लुरकी, बारी |
| गला | सुता, सूतिया, पुतरी, दुलरी, तिलरी, हँसली, रुपिया माला |
| बांह (Arm) | बांहूटा, नागमोरी, पहुंची |
| कलाई (Wrist) | ऐंठी, ककनी (चूड़ी), पटा |
| कमर | करधन |
| पैर (Ankle) | सांटी, पैरी, पायल, तोड़ा |
| पैर की उंगली | बिछिया |
गोदना: एक स्थायी आभूषण
गोदना छत्तीसगढ़ की संस्कृति का एक अभिन्न अंग है, जिसे सिर्फ अलंकरण नहीं, बल्कि एक स्थायी आभूषण और सामाजिक पहचान माना जाता है। बैगा और देवार जनजातियाँ गोदना गोदने की कला के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
(नोट: इन सभी शिल्पों, आभूषणों और जीवनशैली पर विस्तृत ‘क्लस्टर पोस्ट’ जल्द ही प्रकाशित किए जाएंगे।)
5. छत्तीसगढ़ का साहित्य एवं प्रमुख साहित्यकार
छत्तीसगढ़ की साहित्यिक परंपरा गंगा की तरह निर्मल और अविरल रही है, जिसमें लोक साहित्य की चंचलता, भक्ति की गहराई और आधुनिक विचारों का संगम देखने को मिलता है।
छत्तीसगढ़ी साहित्य का काल-विभाजन
-
गाथा काल (1000-1500 ई.): यह छत्तीसगढ़ी साहित्य का मौखिक (Oral) परंपरा का काल था। इस काल में साहित्य लिखित रूप में नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाने वाली कहानियों, पहेलियों और कहावतों के रूप में जीवित था।
- प्रमुख रूप: जनऊला (पहेलियाँ), हाना (लोकोक्तियाँ), और लोकगाथाएँ।
- उदाहरण: ‘फुलबासन’, ‘राजा वीर सिंह’, और ‘सीता-हरण’ जैसी लोकगाथाएँ इस काल की देन हैं।
-
भक्ति काल / मध्य काल (1500-1900 ई.): इस काल में छत्तीसगढ़ की धरती पर महान संतों का प्रभाव पड़ा, जिन्होंने साहित्य को भक्ति और सामाजिक सुधार से जोड़ा।
- प्रमुख प्रभाव: कबीरपंथ और सतनाम पंथ।
- प्रमुख साहित्य: इस काल का अधिकांश साहित्य पद्य रूप में है, जिसमें **गुरु घासीदास की वाणियाँ (सात वचन)**, **कबीरदास के भजन**, और अन्य संत कवियों की रचनाएँ शामिल हैं।
- आधुनिक काल (1900 ई. से अब तक): यह छत्तीसगढ़ी साहित्य का ‘स्वर्ण काल’ माना जाता है, जिसमें गद्य और पद्य दोनों विधाओं में अभूतपूर्व विकास हुआ।
आधुनिक काल के प्रमुख साहित्यकार
| साहित्यकार | उपाधि / उपनाम | प्रमुख रचना / योगदान |
|---|---|---|
| पं. सुंदरलाल शर्मा | छत्तीसगढ़ का गांधी, प्रथम स्वप्नदृष्टा | छत्तीसगढ़ी दानलीला, प्रहलाद चरित्र, करुणा पचीसी |
| प्यारेलाल गुप्त | छत्तीसगढ़ का पाणिनि | प्राचीन छत्तीसगढ़ (इतिहास ग्रंथ), लवंग लता (उपन्यास) |
| पं. मुकुटधर पाण्डेय | छायावाद के जनक | कुररी के प्रति (प्रथम छायावादी कविता), पूजा के फूल |
| गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ | प्रगतिशील कविता के स्तंभ | चाँद का मुँह टेढ़ा है, ब्रह्मराक्षस, कामायनी: एक पुनर्विचार |
| विनय कुमार पाठक | – | छत्तीसगढ़ी साहित्य और उसका इतिहास, एक झलक |
| हरि ठाकुर | – | लोहे का नगर, सुरता के चंदन (छत्तीसगढ़ी गीत संग्रह) |
6. सांस्कृतिक संस्थान एवं सम्मान
छत्तीसगढ़ सरकार अपनी अनूठी कला एवं संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए निरंतर प्रयास कर रही है।
- पुरखौती मुक्तांगन: यह रायपुर में स्थित एक विशाल खुला संग्रहालय है, जहाँ छत्तीसगढ़ की सम्पूर्ण जनजातीय संस्कृति, लोक कलाओं और जीवन शैली को एक ही स्थान पर जीवंत मॉडलों के माध्यम से दर्शाया गया है।
- चक्रधर समारोह: यह रायगढ़ में गणेश चतुर्थी के अवसर पर आयोजित होने वाला एक 10-दिवसीय राष्ट्रीय स्तर का शास्त्रीय संगीत और नृत्य का प्रतिष्ठित उत्सव है, जो राजा चक्रधर सिंह की स्मृति में मनाया जाता है।
- राज्य सम्मान: छत्तीसगढ़ सरकार कला और संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए कई राज्य-स्तरीय सम्मान प्रदान करती है, जैसे – दाऊ मंदराजी सम्मान (लोक कला), चक्रधर सम्मान (संगीत एवं कला), और देवदास बंजारे स्मृति पुरस्कार (पंथी नृत्य)।
निष्कर्ष
संक्षेप में, छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति एक विशाल और बहुरंगी महासागर है, जिसकी हर लहर एक नई कहानी कहती है। इस पिलर पोस्ट ने आपको इसकी कुछ प्रमुख धाराओं से परिचित कराया है – जनजातियों की अनूठी परंपराओं से लेकर पंडवानी के अंतर्राष्ट्रीय मंच तक, और हरेली के स्थानीय उत्सव से लेकर बस्तर के विश्व प्रसिद्ध दशहरे तक। यह सिर्फ एक शुरुआत है। प्रत्येक विषय अपने आप में एक गहरा संसार है, जिसे हम भविष्य के क्लस्टर पोस्ट्स में और भी विस्तार से जानेंगे। यह समृद्ध सांस्कृतिक विरासत ही छत्तीसगढ़ को ‘अतुल्य भारत’ का एक अनमोल रत्न बनाती है।
स्रोत और संदर्भ (Sources & References)
छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति पर यह लेख गहन शोध और विश्वसनीय स्रोतों पर आधारित है ताकि आपको सबसे सटीक जानकारी प्रदान की जा सके। छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति पर और अधिक विस्तृत और आधिकारिक अध्ययन के लिए आप निम्नलिखित संसाधनों का उल्लेख कर सकते हैं:
- “छत्तीसगढ़ वृहद संदर्भ” – डॉ. परदेशी राम वर्मा: यह पुस्तक छत्तीसगढ़ के इतिहास, भूगोल और संस्कृति पर एक प्रामाणिक ग्रंथ मानी जाती है।
- संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन: यह छत्तीसगढ़ सरकार की आधिकारिक वेबसाइट है, जहाँ सांस्कृतिक गतिविधियों, सम्मानों और संस्थानों की नवीनतम जानकारी उपलब्ध है।
- आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग, छत्तीसगढ़: यह वेबसाइट राज्य की जनजातियों, उनकी योजनाओं और सांस्कृतिक विरासत पर विस्तृत और आधिकारिक जानकारी प्रदान करती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: ‘पिलर पोस्ट’ और ‘क्लस्टर पोस्ट’ में क्या अंतर है?
‘पिलर पोस्ट’ एक व्यापक विषय (जैसे छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति) का एक विस्तृत अवलोकन होता है, जो उस विषय के सभी मुख्य पहलुओं का परिचय देता है। ‘क्लस्टर पोस्ट’ उस पिलर में बताए गए किसी एक विशिष्ट उप-विषय (जैसे लोक नृत्य) पर एक बहुत ही गहन और विस्तृत लेख होता है।
प्रश्न 2: छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जनजातीय समूह कौन सा है?
गोंड जनजाति छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जनजातीय समूह है, जो राज्य के लगभग सभी हिस्सों में निवास करती है और उनकी संस्कृति प्रदेश की पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
प्रश्न 3: विश्व का सबसे लंबी अवधि तक चलने वाला दशहरा कहाँ मनाया जाता है?
विश्व का सबसे लंबी अवधि (75 दिन) तक चलने वाला दशहरा छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में मनाया जाता है। यह दशहरा माँ दंतेश्वरी को समर्पित है और इसकी परंपराएं अद्वितीय हैं।
प्रश्न 4: ‘छत्तीसगढ़ का गांधी’ किसे कहा जाता है?
पं. सुंदरलाल शर्मा को उनके सामाजिक सुधारों, स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान और साहित्यिक कार्यों के लिए ‘छत्तीसगढ़ का गांधी’ कहा जाता है।
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