छत्तीसगढ़ में नगरीय स्वशासन यदि गाँव छत्तीसगढ़ की आत्मा हैं, तो शहर इसकी धड़कन हैं – विकास, व्यापार और आधुनिक जीवन के धड़कते हुए केंद्र। इन शहरों को सुचारू रूप से चलाने, नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने और उनके सुनियोजित विकास को सुनिश्चित करने वाली प्रणाली ही ‘नगरीय स्वशासन’ कहलाती है। यह शहरी लोकतंत्र की वह नींव है जिस पर एक आधुनिक और विकसित छत्तीसगढ़ का निर्माण होता है।
M S WORLD The WORLD of HOPE के मुख्य पिलर पोस्ट छत्तीसगढ़ का प्रशासनिक ढांचा के अंतर्गत हमने पंचायती राज व्यवस्था के बारे में पढ़ा अब इस व्यापक क्लस्टर पोस्ट में, हम छत्तीसगढ़ के शहरी प्रशासन की गहराई में उतरेंगे। हम 74वें संविधान संशोधन के ऐतिहासिक प्रावधानों से लेकर छत्तीसगढ़ के विशिष्ट नगरीय निकाय अधिनियमों तक का विश्लेषण करेंगे।
हम नगर निगम के महापौर की शक्तियों से लेकर एक छोटी नगर पंचायत के गठन की प्रक्रिया तक, हर पहलू को सरलता और विस्तार से समझेंगे। यह गाइड CGPSC और Vyapam के अभ्यर्थियों के लिए एक ‘वन-स्टॉप सॉल्यूशन’ बनने के लक्ष्य के साथ लिखी गई है, ताकि आपको इस महत्वपूर्ण विषय के लिए किसी और स्रोत की ओर देखने की आवश्यकता न पड़े।
इस लेख में आप क्या पढ़ेंगे?
- परीक्षा फोकस: CGPSC प्रीलिम्स vs. मेन्स
- संवैधानिक आधार: 74वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992
- छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम, 1961 की मुख्य विशेषताएं
- छत्तीसगढ़ में त्रि-स्तरीय नगरीय निकाय
- नगरीय निकायों में चुनाव प्रक्रिया
- नगरीय निकायों में आरक्षण की व्यवस्था
- मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) की भूमिका
- नगरीय स्वशासन की चुनौतियाँ एवं सुधार
- नगरीय निकायों की आय के स्रोत
- जिला योजना समिति (DPC)
- 11वीं बनाम 12वीं अनुसूची (तुलना)
- त्रि-स्तरीय निकायों की तुलनात्मक तालिका
- CGPSC मेन्स अभ्यास प्रश्न
- निष्कर्ष
- M S WORLD पर और अन्वेषण करें
- स्रोत और संदर्भ
- ज्ञान की परीक्षा: नगरीय स्वशासन क्विज़
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
परीक्षा फोकस: CGPSC प्रीलिम्स vs. मेन्स
पंचायती राज की तरह ही, नगरीय स्वशासन भी परीक्षा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे तैयार करने के लिए एक सटीक रणनीति अपनाएं:
- प्रीलिम्स (Prelims) के लिए: यहाँ तथ्यों पर जोर होता है। जैसे – नगर निगम के गठन के लिए न्यूनतम जनसंख्या कितनी होनी चाहिए? महापौर का चुनाव प्रत्यक्ष होता है या अप्रत्यक्ष? 74वें संशोधन द्वारा कौन सी अनुसूची जोड़ी गई? वार्डों की न्यूनतम और अधिकतम संख्या, आरक्षण के प्रतिशत और प्रमुख अधिकारियों की भूमिका से सीधे प्रश्न बनते हैं।
- मेन्स (Mains) के लिए: यहाँ आपकी विश्लेषणात्मक और व्यावहारिक समझ का परीक्षण होता है। प्रश्न इस प्रकार हो सकते हैं – ‘छत्तीसगढ़ के शहरी क्षेत्रों में नियोजित विकास सुनिश्चित करने में नगर निगमों की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।’ या ‘शहरी स्थानीय निकायों के सामने प्रमुख वित्तीय चुनौतियाँ क्या हैं? उन्हें दूर करने के लिए उपाय सुझाइए।’
संवैधानिक आधार: 74वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992
जिस प्रकार 73वें संशोधन ने पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया, उसी प्रकार 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 ने शहरी स्थानीय निकायों, यानी नगर पालिकाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया। इस संशोधन ने देश भर में शहरी शासन के लिए एक समान और मजबूत ढाँचा तैयार किया, जिससे वे केवल राज्य सरकार की कार्यकारी इकाइयाँ न रहकर ‘स्व-शासन की संस्थाओं’ के रूप में स्थापित हुईं।
74वें संशोधन की प्रमुख विशेषताएं:
- संवैधानिक दर्जा: इस संशोधन ने संविधान में एक नया भाग-IX(क) जोड़ा, जिसे ‘नगर पालिकाएं’ नाम दिया गया। इसके तहत अनुच्छेद 243-P से 243-ZG तक के प्रावधान शामिल किए गए।
- बारहवीं अनुसूची: संविधान में एक नई 12वीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें नगर पालिकाओं को हस्तांतरित किए जाने वाले 18 विषयों की सूची है, जैसे- शहरी नियोजन, सड़कें और पुल, जल आपूर्ति, सार्वजनिक स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन, और शहरी सुविधाएं।
- त्रि-स्तरीय संरचना का प्रावधान: संशोधन ने तीन प्रकार के नगरीय निकायों का प्रावधान किया:
- नगर पंचायत: संक्रमणशील क्षेत्रों के लिए (जो गांव से शहर में बदल रहे हैं)।
- नगर पालिका परिषद: छोटे शहरी क्षेत्रों के लिए।
- नगर पालिक निगम: बड़े शहरी क्षेत्रों के लिए।
- वार्ड समितियों का गठन: 3 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगर पालिकाओं के क्षेत्र में वार्डों के समूह के लिए ‘वार्ड समितियों’ के गठन को अनिवार्य किया गया।
- नियमित चुनाव और कार्यकाल: सभी नगर पालिकाओं का कार्यकाल 5 वर्ष के लिए निश्चित किया गया और नियमित चुनाव कराने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग को ही जिम्मेदारी सौंपी गई (जो पंचायतों के चुनाव भी कराता है)।
- आरक्षण की व्यवस्था: पंचायतों की तरह ही, नगर पालिकाओं में भी जनसंख्या के अनुपात में SC और ST के लिए सीटों का आरक्षण, और सभी स्तरों पर कम से कम एक-तिहाई (1/3) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं।
- राज्य वित्त आयोग: पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने वाला राज्य वित्त आयोग ही नगर पालिकाओं की भी वित्तीय स्थिति की समीक्षा करेगा और उनकी मजबूती के लिए सिफारिशें देगा।
छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम, 1961 की मुख्य विशेषताएं
74वें संशोधन के अनुरूप, छत्तीसगढ़ में शहरी शासन मुख्य रूप से दो अधिनियमों द्वारा निर्देशित होता है, जिन्हें मध्य प्रदेश से अनुकूलित किया गया है:
- छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम अधिनियम, 1956 (Municipal Corporation Act) – यह नगर निगमों पर लागू होता है।
- छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम, 1961 (Municipality Act) – यह नगर पालिका परिषदों और नगर पंचायतों पर लागू होता है।
अधिनियमों के प्रमुख प्रावधान:
- त्रि-स्तरीय संरचना की स्थापना: अधिनियम स्पष्ट रूप से नगर निगम, नगर पालिका परिषद और नगर पंचायत की संरचना, उनके गठन के लिए आवश्यक जनसंख्या और अन्य मानदंडों को परिभाषित करते हैं।
- महापौर/अध्यक्ष और पार्षदों की भूमिका: ये अधिनियम महापौर (नगर निगम में) और अध्यक्ष (नगर पालिका/नगर पंचायत में) के साथ-साथ पार्षदों की शक्तियों, कार्यों, चुनाव और उन्हें हटाने की प्रक्रियाओं का विस्तृत वर्णन करते हैं।
- मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO): अधिनियम में एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी का प्रावधान है, जो राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एक प्रशासनिक अधिकारी होता है और निकाय के दिन-प्रतिदिन के प्रशासन के लिए जिम्मेदार होता है।
- कराधान और वित्त: अधिनियम नगरीय निकायों को विभिन्न कर (जैसे- संपत्ति कर, जल कर) लगाने, शुल्क वसूलने और अपनी आय के स्रोत उत्पन्न करने की शक्तियाँ प्रदान करते हैं।
- प्रत्यक्ष बनाम अप्रत्यक्ष चुनाव: छत्तीसगढ़ में समय-समय पर महापौर/अध्यक्ष के चुनाव की पद्धति में बदलाव होता रहा है। अधिनियम सरकार को यह शक्ति देता है कि वह चुनाव को प्रत्यक्ष (जनता द्वारा) या अप्रत्यक्ष (पार्षदों द्वारा) रूप से कराने का निर्णय ले सके।
रिवीजन बॉक्स: महत्वपूर्ण तथ्य
- 74वां संशोधन लागू हुआ: 1 जून 1993।
- संविधान में जोड़ा गया: भाग-IX(क) और 12वीं अनुसूची।
- 12वीं अनुसूची में विषय: 18 विषय।
- छत्तीसगढ़ में लागू अधिनियम: नगर पालिक निगम अधिनियम, 1956 और नगरपालिका अधिनियम, 1961।
- वित्त और चुनाव आयोग: पंचायतों और नगरीय निकायों के लिए एक ही राज्य वित्त आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग होता है।

छत्तीसगढ़ में त्रि-स्तरीय नगरीय निकाय
74वें संशोधन और राज्य के नगरपालिका अधिनियमों के आधार पर, छत्तीसगढ़ में शहरी क्षेत्रों को उनकी जनसंख्या और राजस्व के आधार पर तीन प्रकार की स्वशासी इकाइयों में बांटा गया है:
I. नगर पालिक निगम (Municipal Corporation)
नगर पालिक निगम या नगर निगम, बड़े महानगरीय क्षेत्रों के लिए स्थापित उच्चतम (supreme) शहरी निकाय है। यह सबसे अधिक शक्तियों और संसाधनों से युक्त होता है।
गठन के लिए मानदंड
- सामान्यतः, 1 लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरी क्षेत्रों में नगर निगम का गठन किया जाता है।
- इसके अलावा, प्रति व्यक्ति आय और गैर-कृषि कार्यों में लगी जनसंख्या का प्रतिशत भी देखा जाता है।
संरचना और प्रमुख अंग
नगर निगम के तीन प्रमुख अंग होते हैं:
- परिषद (Council): यह निगम का विधायी अंग है, जिसमें पार्षद और एल्डरमेन शामिल होते हैं।
- वार्ड: प्रत्येक नगर निगम को न्यूनतम 40 और अधिकतम 70 वार्डों में बांटा जाता है।
- पार्षद (Councillor): प्रत्येक वार्ड से एक पार्षद का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा 5 वर्ष के लिए किया जाता है।
- एल्डरमेन (Alderman): राज्य सरकार द्वारा निगम में विशेष ज्ञान या अनुभव रखने वाले कुछ सदस्यों को मनोनीत किया जाता है, जिन्हें एल्डरमेन कहते हैं। इन्हें मतदान का अधिकार नहीं होता।
- महापौर और अध्यक्ष/सभापति (Mayor and Speaker):
- महापौर (Mayor): यह निगम का प्रथम नागरिक और राजनीतिक प्रमुख होता है। (चुनाव प्रक्रिया अगले खंड में विस्तृत है)। महापौर परिषद की बैठकों की अध्यक्षता करता है।
- अध्यक्ष/सभापति (Speaker): पार्षदों द्वारा अपने में से एक अध्यक्ष का चुनाव किया जाता है जो महापौर की अनुपस्थिति में बैठकों की अध्यक्षता करता है।
- निगम आयुक्त (Municipal Commissioner):
- यह निगम का मुख्य प्रशासनिक और कार्यकारी अधिकारी होता है।
- यह राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है और सामान्यतः एक IAS या वरिष्ठ राज्य प्रशासनिक सेवा का अधिकारी होता है।
- परिषद द्वारा लिए गए निर्णयों को लागू करना, निगम के कर्मचारियों पर नियंत्रण रखना और बजट तैयार करना इसका मुख्य कार्य है।
प्रमुख कार्य
नगर निगम 12वीं अनुसूची में वर्णित लगभग सभी कार्य करता है, जैसे – जल आपूर्ति, सीवरेज, कचरा प्रबंधन, सड़कों और स्ट्रीट लाइट का रखरखाव, जन्म-मृत्यु पंजीकरण, बाजार और पार्क का निर्माण, और शहरी नियोजन।
II. नगर पालिका परिषद (Municipal Council)
नगर पालिका परिषद छोटे शहरों और कस्बों के लिए गठित की जाती है। यह नगर निगम से छोटी, लेकिन नगर पंचायत से बड़ी इकाई है।
गठन के लिए मानदंड
- सामान्यतः, 20,000 से 1 लाख के बीच की जनसंख्या वाले शहरी क्षेत्रों में नगर पालिका परिषद का गठन किया जाता है।
संरचना
- वार्ड: प्रत्येक नगर पालिका को न्यूनतम 15 और अधिकतम 40 वार्डों में बांटा जाता है।
- पार्षद: प्रत्येक वार्ड से एक पार्षद का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा किया जाता है।
- अध्यक्ष और उपाध्यक्ष (President and Vice-President): नगर पालिका के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष) सरकार के नियमों के अनुसार होता है।
- मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO): यह परिषद का मुख्य प्रशासनिक अधिकारी होता है, जो राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है।

III. नगर पंचायत (Nagar Panchayat)
नगर पंचायत एक संक्रमणशील क्षेत्र के लिए गठित की जाती है, अर्थात ऐसा ग्रामीण क्षेत्र जो धीरे-धीरे शहरी क्षेत्र में परिवर्तित हो रहा है।
गठन के लिए मानदंड
- सामान्यतः, 5,000 से 20,000 के बीच की जनसंख्या वाले संक्रमणशील क्षेत्रों में नगर पंचायत का गठन किया जाता है।
संरचना
- वार्ड: प्रत्येक नगर पंचायत को न्यूनतम 15 वार्डों में बांटा जाता है।
- पार्षद: प्रत्येक वार्ड से एक पार्षद का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा किया जाता है।
- अध्यक्ष और उपाध्यक्ष: नगर पंचायत के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव भी सरकार के नियमों के अनुसार होता है।
- मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO): इसका प्रशासनिक प्रमुख भी CMO होता है।
रिवीजन बॉक्स: प्रमुख अंतर
- 1 लाख+ जनसंख्या: नगर निगम
- 20 हजार से 1 लाख जनसंख्या: नगर पालिका परिषद
- 5 हजार से 20 हजार जनसंख्या: नगर पंचायत
- राजनीतिक प्रमुख (नगर निगम): महापौर (Mayor)
- राजनीतिक प्रमुख (नगर पालिका/पंचायत): अध्यक्ष (President)
- प्रशासनिक प्रमुख (नगर निगम): आयुक्त (Commissioner)
- प्रशासनिक प्रमुख (नगर पालिका/पंचायत): मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO)
नगरीय निकायों में चुनाव प्रक्रिया
छत्तीसगढ़ में नगरीय निकायों के चुनाव की प्रक्रिया राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा संपन्न कराई जाती है। इसमें पार्षदों का चुनाव हमेशा प्रत्यक्ष रूप से होता है, लेकिन महापौर/अध्यक्ष के चुनाव की पद्धति में राज्य सरकार समय-समय पर परिवर्तन करती रही है।
महापौर/अध्यक्ष का चुनाव: प्रत्यक्ष बनाम अप्रत्यक्ष
यह छत्तीसगढ़ की राजव्यवस्था का एक बहुत ही चर्चित और परिवर्तनशील पहलू रहा है:
- प्रत्यक्ष निर्वाचन (Direct Election): इस प्रणाली में, शहर के सभी मतदाता अपने पार्षदों के साथ-साथ सीधे अपने महापौर/अध्यक्ष के लिए भी मतदान करते हैं। यह प्रणाली महापौर/अध्यक्ष को एक मजबूत जनादेश प्रदान करती है।
- अप्रत्यक्ष निर्वाचन (Indirect Election): इस प्रणाली में, मतदाता केवल अपने-अपने वार्ड के पार्षदों को चुनते हैं। फिर ये चुने हुए पार्षद अपने में से ही किसी एक को महापौर/अध्यक्ष के रूप में चुनते हैं।
वर्तमान स्थिति (2019 के संशोधन के बाद): छत्तीसगढ़ सरकार ने 2019 में अधिनियम में संशोधन कर महापौर/अध्यक्ष के चुनाव को अप्रत्यक्ष (Indirect) प्रणाली से कराने का निर्णय लिया है। अतः, वर्तमान में चुने हुए पार्षद ही महापौर/अध्यक्ष का चुनाव करते हैं।
नगरीय निकायों में आरक्षण की व्यवस्था
पंचायतों की तरह ही, शहरी स्थानीय निकायों में भी समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए 74वें संशोधन और राज्य के अधिनियमों में आरक्षण की स्पष्ट व्यवस्था की गई है।
- अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण: प्रत्येक नगरीय निकाय में, SC और ST के लिए सीटें (पार्षदों और अध्यक्षों दोनों के लिए) उस निकाय की कुल जनसंख्या में उनकी जनसंख्या के अनुपात के अनुसार आरक्षित की जाती हैं।
- अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण: छत्तीसगढ़ में OBC वर्ग के लिए भी उनकी जनसंख्या के अनुपात में, अधिकतम 25% तक आरक्षण का प्रावधान है (शर्त यह है कि SC/ST/OBC का कुल आरक्षण 50% से अधिक न हो)।
- महिलाओं के लिए आरक्षण: सभी आरक्षित (SC, ST, OBC) और अनारक्षित सीटों में से, कम से कम 1/3 (एक-तिहाई) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाती हैं।
मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) की भूमिका
मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) या नगर निगम के मामले में आयुक्त (Commissioner), नगरीय निकाय की प्रशासनिक मशीनरी का प्रमुख होता है। वह निर्वाचित राजनीतिक विंग (परिषद और महापौर/अध्यक्ष) और राज्य सरकार के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करता है।
प्रमुख कार्य और जिम्मेदारियाँ
- परिषद द्वारा पारित प्रस्तावों और नीतियों को लागू करना।
- नगरीय निकाय का बजट तैयार करना और परिषद के समक्ष प्रस्तुत करना।
- निकाय के कर्मचारियों और अधिकारियों पर प्रशासनिक नियंत्रण रखना।
- वित्तीय मामलों का प्रबंधन करना और रिकॉर्ड बनाए रखना।
- राज्य सरकार के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करना।
संक्षेप में, CMO यह सुनिश्चित करता है कि नगरीय निकाय का प्रशासन अधिनियमों और नियमों के अनुसार कुशलतापूर्वक चले।
नगरीय स्वशासन की चुनौतियाँ एवं सुधार
संवैधानिक दर्जा मिलने के बावजूद, छत्तीसगढ़ में नगरीय निकाय कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जिन्हें समझना मेन्स परीक्षा के लिए आवश्यक है।
प्रमुख चुनौतियाँ
- वित्तीय आत्मनिर्भरता का अभाव: अधिकांश नगरीय निकाय वित्तीय रूप से राज्य सरकार से मिलने वाले अनुदान पर बहुत अधिक निर्भर हैं। उनके पास स्वयं के राजस्व (जैसे- संपत्ति कर) उत्पन्न करने के स्रोत सीमित हैं और कर वसूली की प्रक्रिया भी कमजोर है।
- अकुशल योजना और प्रबंधन: शहरों में अनियोजित विकास, अवैध निर्माण, और यातायात जाम जैसी समस्याएं कुशल शहरी नियोजन की कमी को दर्शाती हैं।
- कर्मचारियों की कमी: कई नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में तकनीकी और प्रशासनिक कर्मचारियों की भारी कमी है, जिससे उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
- राजनीतिक हस्तक्षेप: राज्य सरकार का अत्यधिक नियंत्रण और स्थानीय राजनीति अक्सर निकायों के स्वतंत्र रूप से कार्य करने में बाधा डालती है।
सुधार के लिए सुझाव
- नगरीय निकायों को और अधिक वित्तीय स्वायत्तता और कर लगाने के अधिकार दिए जाने चाहिए।
- ‘अमृत मिशन’ और ‘स्मार्ट सिटी मिशन’ जैसी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन।
- ई-गवर्नेंस को बढ़ावा देकर पारदर्शिता लाना और नागरिक सेवाओं को सुगम बनाना।
- नागरिकों को अपने स्थानीय निकायों के कार्यों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना।
नगरीय निकायों की आय के स्रोत
एक प्रभावी स्वशासन के लिए वित्तीय स्वायत्तता अत्यंत आवश्यक है। नगरीय निकायों की आय के मुख्य रूप से पांच स्रोत होते हैं:
- कर राजस्व (Tax Revenue):
- संपत्ति कर (Property Tax): यह उनकी आय का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण स्रोत है।
- जल कर, प्रकाश कर, स्वच्छता कर।
- व्यापार, व्यवसायों और विज्ञापनों पर कर।
- गैर-कर राजस्व (Non-Tax Revenue):
- विभिन्न सेवाओं के लिए शुल्क (जैसे- जन्म-मृत्यु पंजीकरण शुल्क, भवन निर्माण अनुमति शुल्क)।
- नगरपालिका की संपत्तियों से किराया।
- जुर्माना और दंड।
- राज्य सरकार से अनुदान (Grants from State Govt.): यह उनकी आय का एक बहुत बड़ा हिस्सा होता है, जो उन्हें विभिन्न योजनाओं और वेतन भुगतान के लिए मिलता है।
- ऋण (Loans): वे राज्य सरकार की अनुमति से वित्तीय संस्थानों से विकास कार्यों के लिए ऋण ले सकते हैं।
- केंद्रीय वित्त आयोग का अनुदान: केंद्रीय वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर भी उन्हें केंद्र सरकार से अनुदान प्राप्त होता है।
जिला योजना समिति (District Planning Committee – DPC)
यह 74वें संविधान संशोधन (अनुच्छेद 243-ZD) का एक क्रांतिकारी प्रावधान है, जिसका उद्देश्य जिले के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच विकास की खाई को पाटना है।
- गठन: प्रत्येक जिले में एक जिला योजना समिति का गठन किया जाता है।
- संरचना: इस समिति के कुल सदस्यों में से कम से कम 4/5 (चार-पांचवें) सदस्य, जिले की पंचायतों और नगर पालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से ही चुने जाते हैं।
- मुख्य कार्य: इसका मुख्य कार्य जिले की पंचायतों (ग्रामीण) और नगर पालिकाओं (शहरी) द्वारा तैयार की गई योजनाओं को **समेकित (consolidate)** करना और पूरे जिले के लिए एक **एकीकृत विकास योजना का प्रारूप (draft development plan)** तैयार करना है।
यह समिति सुनिश्चित करती है कि जिले का विकास टुकड़ों में न हो, बल्कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों की जरूरतों को ध्यान में रखकर एक समग्र योजना बनाई जाए।
रिवीजन तालिका: 11वीं अनुसूची बनाम 12वीं अनुसूची
छात्रों को अक्सर इन दोनों अनुसूचियों के विषयों में भ्रम होता है। यह तालिका आपको प्रमुख अंतर याद रखने में मदद करेगी।
| आधार | 11वीं अनुसूची (पंचायतें) | 12वीं अनुसूची (नगर पालिकाएं) |
|---|---|---|
| संवैधानिक संशोधन | 73वां संशोधन, 1992 | 74वां संशोधन, 1992 |
| कुल विषय | 29 विषय | 18 विषय |
| मुख्य फोकस | ग्रामीण विकास और कृषि | शहरी विकास और नियोजन |
| उदाहरण 1 (कृषि) | कृषि, भूमि सुधार, लघु सिंचाई | – (शामिल नहीं) |
| उदाहरण 2 (योजना) | ग्रामीण आवास, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम | नगरीय योजना, गंदी बस्ती सुधार |
| उदाहरण 3 (बुनियादी ढांचा) | ग्रामीण सड़कें, पुलिया, पेयजल | सड़कें और पुल, जल प्रदाय |
| उदाहरण 4 (सामाजिक) | महिला एवं बाल विकास, परिवार कल्याण | सार्वजनिक स्वास्थ्य, समाज कल्याण |
त्रि-स्तरीय निकायों की तुलनात्मक तालिका
आइए, छत्तीसगढ़ की त्रि-स्तरीय नगरीय स्वशासन व्यवस्था के प्रमुख अंतरों को एक त्वरित रिवीजन तालिका के माध्यम से समझें।
| तुलना का आधार | नगर निगम | नगर पालिका परिषद | नगर पंचायत |
|---|---|---|---|
| गठन का आधार (जनसंख्या) | 1 लाख से अधिक | 20 हजार से 1 लाख | 5 हजार से 20 हजार |
| राजनीतिक प्रमुख | महापौर (Mayor) | अध्यक्ष (President) | अध्यक्ष (President) |
| प्रमुख का चुनाव | अप्रत्यक्ष (पार्षदों द्वारा) | अप्रत्यक्ष (पार्षदों द्वारा) | अप्रत्यक्ष (पार्षदों द्वारा) |
| प्रशासनिक प्रमुख | आयुक्त (Commissioner) | मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) | मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) |
| न्यूनतम वार्ड | 40 | 15 | 15 |
| अधिकतम वार्ड | 70 | 40 | – (सामान्यतः 15) |
| लागू अधिनियम | नगर पालिक निगम अधिनियम, 1956 | नगरपालिका अधिनियम, 1961 | नगरपालिका अधिनियम, 1961 |
CGPSC मेन्स अभ्यास प्रश्न
इस विषय पर अपनी विश्लेषणात्मक समझ को और गहरा करने के लिए, निम्नलिखित प्रश्नों पर उत्तर लिखने का प्रयास करें:
- प्रश्न 1: 74वें संविधान संशोधन ने छत्तीसगढ़ में शहरी स्थानीय निकायों को कैसे सशक्त किया है? इसकी मुख्य विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (125 शब्द)
- प्रश्न 2: छत्तीसगढ़ में नगरीय निकायों के समक्ष प्रमुख वित्तीय और प्रशासनिक चुनौतियाँ क्या हैं? इन चुनौतियों से निपटने के लिए व्यावहारिक उपाय सुझाइए। (175 शब्द)
- प्रश्न 3: नगर निगम के आयुक्त और महापौर की भूमिकाओं के बीच अंतर स्पष्ट करें। आपके विचार में, एक शहर के सुचारू प्रशासन के लिए दोनों के बीच सामंजस्य क्यों महत्वपूर्ण है? (100 शब्द)
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ में नगरीय स्वशासन की त्रि-स्तरीय प्रणाली शहरी विकास और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। 74वें संविधान संशोधन द्वारा प्रदान की गई संवैधानिक सुरक्षा ने इन निकायों को पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली और स्वायत्त बनाया है।
नगर निगम, नगर पालिका परिषद और नगर पंचायत, अपने-अपने स्तर पर, शहरी जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं। यद्यपि वित्तीय आत्मनिर्भरता, कुशल योजना और जन-भागीदारी जैसी चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं, तथापि यह स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ के शहरों का भविष्य इन्हीं सशक्त स्थानीय निकायों के कंधों पर टिका है।
एक अभ्यर्थी के लिए इस प्रणाली को समझना न केवल परीक्षा के लिए, बल्कि एक जागरूक नागरिक और एक भावी प्रशासक के रूप में भी अनिवार्य है।
M S WORLD पर और अन्वेषण करें
छत्तीसगढ़ सामान्य ज्ञान की अपनी तैयारी को और मज़बूत करने के लिए, हमारे अन्य महत्वपूर्ण विषयों को भी पढ़ें:
- छत्तीसगढ़ का प्रशासनिक ढाँचा – हमारे मुख्य पिलर पोस्ट को पढ़ें।
- छत्तीसगढ़ में पंचायती राज – ग्रामीण स्वशासन पर हमारी विस्तृत गाइड।
- छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था – राज्य के आर्थिक पहलुओं को समझें।
स्रोत और संदर्भ
इस लेख में दी गई जानकारी विश्वसनीय और प्रामाणिक स्रोतों पर आधारित है:
- भारत की राजव्यवस्था – एम. लक्ष्मीकांत
- छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम अधिनियम, 1956
- छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम, 1961
- बाहरी स्रोत: नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग, छत्तीसगढ़ शासन
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: क्या नगर निगम में एल्डरमेन मतदान कर सकते हैं?
नहीं, एल्डरमेन राज्य सरकार द्वारा मनोनीत सदस्य होते हैं। उन्हें परिषद की बैठकों में भाग लेने और अपनी सलाह देने का अधिकार तो होता है, लेकिन उन्हें किसी भी विषय पर मतदान करने का अधिकार नहीं होता।
प्रश्न 2: महापौर और आयुक्त में क्या मुख्य अंतर है?
महापौर नगर निगम का निर्वाचित राजनीतिक प्रमुख (Political Head) होता है, जो परिषद की अध्यक्षता करता है। वहीं, आयुक्त राज्य सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासनिक प्रमुख (Administrative Head) होता है, जो परिषद के निर्णयों को लागू करता है।
प्रश्न 3: छत्तीसगढ़ में महिलाओं के लिए शहरी निकायों में कितना आरक्षण है?
पंचायतों के विपरीत, जहाँ छत्तीसगढ़ सरकार ने 50% आरक्षण दिया है, शहरी निकायों में अभी भी 74वें संशोधन का मूल प्रावधान ही लागू है। इसके अनुसार, सभी स्तरों पर कुल सीटों में से कम से कम एक-तिहाई (1/3) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।
प्रश्न 4: ‘वार्ड समिति’ क्या होती है?
74वें संशोधन के अनुसार, 3 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगर निगमों में, कई वार्डों को मिलाकर एक ‘वार्ड समिति’ का गठन किया जाता है। इसका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर समस्याओं की पहचान करना और उनके समाधान के लिए परिषद को सुझाव देना है, ताकि प्रशासन और भी अधिक विकेंद्रीकृत हो सके।
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1 thought on “छत्तीसगढ़ में नगरीय स्वशासन: नगर निगम से नगर पंचायत तक की संपूर्ण प्रणाली (CGPSC Guide)”